नई दिल्ली: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पवन पर्व के ठीक अगले दिन देशभर में दही हांडी का उत्सव अत्यंत उल्लास और उमंग के साथ मनाया जा रहा है। जन्माष्टमी के बाद मनाए जाने वाले इस लोक पर्व का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की उन बाल लीलाओं से है, जब वे गोकुल और वृंदावन की गलियों में अपने नटखट सखाओं के साथ माखन और दही चुराया करते थे। गोपियां माखन को बचाने के लिए मटकियों को छत की ऊंचाइयों पर टांग दिया करती थीं, लेकिन कान्हा अपनी चतुर योजना और मित्रों के सहयोग से मानव पिरामिड बनाकर वहां तक पहुंच ही जाते थे। आज भी भक्त उन्हीं बाल लीलाओं को जीवंत करते हुए माखन मटकी फोड़ने की इस जीवंत परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
नश्वर शरीर और मोह से मुक्ति का प्रतीक
दही हांडी में मटकी का फूटना मानव जीवन के सबसे बड़े सत्य को भी उजागर करता है। मिट्टी की हांडी मनुष्य के इस नश्वर शरीर का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि उसके भीतर रखा माखन आत्मा की अमरता का प्रतीक है।
जिस तरह हांडी के टूटने पर माखन बाहर आता है, ठीक उसी प्रकार सांसारिक मोह-माया, अहंकार और भौतिक बंधनों की मटकी को तोड़कर ही आत्मा को परमात्मा से जोड़ा जा सकता है।
गोविंदाओं की टोली और उत्सव का स्वरूप
दही हांडी के इस पावन आयोजन में एक मिट्टी की मटकी में दही, माखन और मेवे भरकर उसे काफी ऊंचाई पर रस्सी के सहारे बांध दिया जाता है। इसके बाद युवाओं की टोलियां, जिन्हें ‘गोविंदा’ कहा जाता है, ढोल-नगाड़ों की गूंज और श्रीकृष्ण के जयकारों के बीच एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव श्रृंखला बनाते हैं। हवा में लहराते इन पिरामिडों के माध्यम से सबसे ऊपर पहुंचा गोविंदा मटकी फोड़कर माखन प्रसाद वितरित करता है। वर्तमान समय में कई स्थानों पर इस आयोजन को भव्य रूप देने के लिए बड़े-बड़े पुरस्कार भी रखे जाते हैं, जिससे इस सांस्कृतिक उत्सव का उत्साह कई गुना बढ़ जाता है।
हांडी और माखन के जरिए छुपा जीवन दर्शन
सतही तौर पर केवल एक खेल या आनंद का माध्यम दिखने वाली दही हांडी की इस परंपरा के पीछे गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा हुआ है। दूध और दही को लगातार मथने के बाद ही मक्खन की प्राप्ति होती है, जो इस बात का प्रतीक है कि जीवन के संघर्षों और कठिनाइयों से गुजरने के बाद ही मनुष्य का हृदय निर्मल और पवित्र बनता है। भगवान कृष्ण उसी पवित्र माखन यानी निर्मल मन को अपनाते हैं। इसके अलावा, माखन चुराकर अकेले खाने के बजाय अपने सखाओं, बछड़ों और पशु-पक्षियों में बांटना समाज में आपसी प्रेम, एकता और मिल-जुलकर रहने की सीख देता है। यही कारण है कि यह पर्व केवल मटकी फोड़ने का उत्साह भर नहीं है, बल्कि भक्ति, समर्पण और जीवन के सार को समझने का एक सुंदर जरिया है।












