Chaturmas 2026: 25 जुलाई से शुरू होगा 119 दिनों का पावन काल, जानिए क्यों नहीं होते इस दौरान शुभ कार्य

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Chaturmas 2026: The 119-day holy period begins on July 25. Find out why auspicious events are not performed during this period
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नई दिल्ली: सनातन धर्म में कई ऐसी परंपराएं हैं, जिनका उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं बल्कि व्यक्ति के जीवन में अनुशासन, संयम और आध्यात्मिक जागरूकता लाना भी होता है. चातुर्मास इसी तरह का एक विशेष काल माना जाता है. यह चार महीनों की पवित्र अवधि होती है, जब श्रद्धालु भक्ति, साधना, व्रत और आत्मचिंतन के माध्यम से अपने जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करते हैं. धार्मिक मान्यता है कि इस दौरान किए गए पुण्य कार्यों का प्रभाव अधिक शुभ माना जाता है, इसलिए देशभर में लाखों लोग चातुर्मास का विशेष रूप से पालन करते हैं.

हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में चातुर्मास की शुरुआत 25 जुलाई, शनिवार से होगी. यह दिन आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का है, जिसे बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इसी दिन से भगवान विष्णु के योग निद्रा में जाने की मान्यता जुड़ी हुई है. वहीं, चातुर्मास का समापन 20 नवंबर, शुक्रवार को देवउठनी एकादशी के साथ होगा. कार्तिक शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को भगवान विष्णु के जागरण का दिन माना जाता है. इस प्रकार यह धार्मिक अवधि लगभग 119 दिनों तक चलेगी.

चातुर्मास में कौन से महीने शामिल होते हैं?

चातुर्मास शब्द का अर्थ ही चार महीनों का समूह है. इस दौरान श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक मास आते हैं. हिंदू धर्म में इन चारों महीनों का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है. इन महीनों में पूजा-पाठ, व्रत, कथा, दान और धार्मिक अनुष्ठानों का महत्व बढ़ जाता है. कई लोग इस दौरान विशेष नियमों का पालन करते हैं और अपनी दिनचर्या में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास करते हैं.

भगवान विष्णु की योग निद्रा से जुड़ी मान्यता

धार्मिक कथाओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं. मान्यता है कि इस दौरान वे राजा बलि के लोक में विश्राम करते हैं और चार महीने तक विश्राम अवस्था में रहते हैं. इसके बाद देवउठनी एकादशी के दिन भगवान पुनः जागते हैं. इसी के साथ विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों की शुरुआत भी दोबारा होने लगती है. यही कारण है कि यह पूरा काल भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष माना जाता है.

चातुर्मास का धार्मिक महत्व क्या है?

धार्मिक दृष्टि से चातुर्मास आत्मिक शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का समय माना जाता है. इस अवधि में लोग सांसारिक आकर्षणों से दूरी बनाकर ईश्वर भक्ति में अधिक समय देने का प्रयास करते हैं. मान्यता है कि इस दौरान किए गए जप, तप, दान और पूजा का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है. इसलिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं और अपने जीवन में संयम तथा अनुशासन अपनाने का संकल्प लेते हैं.

मांगलिक कार्यों पर क्यों लगती है रोक?

चातुर्मास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ संस्कार और नए व्यापार की शुरुआत जैसे शुभ कार्य आमतौर पर नहीं किए जाते. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु के विश्राम काल में मांगलिक कार्यों को टालना उचित माना जाता है. इसलिए अधिकांश लोग देवउठनी एकादशी के बाद ही ऐसे कार्यक्रम आयोजित करते हैं.

साधु-संत एक ही स्थान पर क्यों रहते हैं?

चातुर्मास वर्षा ऋतु के दौरान आता है. बारिश के मौसम में यात्रा करना कठिन हो जाता है और प्रकृति में छोटे जीव-जंतुओं की संख्या भी बढ़ जाती है. इसी कारण साधु-संत और ऋषि-मुनि इस अवधि में एक स्थान पर रहकर साधना, प्रवचन और धार्मिक कार्यों में समय बिताते हैं. इस परंपरा को वर्षावास या चौमासा कहा जाता है. इसका उद्देश्य जीवों की रक्षा के साथ-साथ आध्यात्मिक साधना पर ध्यान केंद्रित करना भी है.

चातुर्मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मसंयम, अनुशासन और सकारात्मक जीवनशैली अपनाने का भी अवसर प्रदान करता है. यह चार महीनों का ऐसा समय है जो व्यक्ति को भक्ति, ध्यान और आत्मचिंतन के माध्यम से अपने जीवन को नई दिशा देने की प्रेरणा देता है. यही वजह है कि सनातन परंपरा में चातुर्मास को अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना गया है.

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