एक मामूली एटीएम लेन-देन अब बैंक के लिए करोड़ों का सबक बन चुका है. गुजरात के सूरत में फरवरी 2017 में एक व्यक्ति ने सिर्फ 10,000 रुपये निकालने की कोशिश की थी. एटीएम ने पैसे नहीं दिए, लेकिन खाते से राशि कट गई. ग्राहक ने शिकायत की, लेकिन बैंक ने जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया. नौ साल की कानूनी लड़ाई, अनगिनत ईमेल, आरटीआई और उपभोक्ता फोरम के चक्कर काटने के बाद आखिरकार न्याय मिला. बैंक ऑफ बड़ौदा को अब मूल राशि के साथ ब्याज और भारी मुआवजा चुकाना पड़ रहा है, जो मूल रकम से लगभग 30 गुना ज्यादा है.
एटीएम गड़बड़ी से शुरू हुई मुसीबत
18 फरवरी 2017 को सूरत के उधना इलाके में एक ग्राहक ने एसबीआई एटीएम से 10,000 रुपये निकालने की कोशिश की. कार्ड डाला, पिन डाला, लेकिन मशीन ने न तो पैसे दिए और न ही रसीद छापी. कुछ देर बाद मोबाइल पर मैसेज आया कि 10,000 रुपये डेबिट हो गए. ग्राहक हैरान रह गया. उसने तुरंत बैंक ऑफ बड़ौदा के डुम्भल शाखा में लिखित शिकायत दर्ज की.
शिकायतों का सिलसिला, कोई जवाब नहीं
फरवरी से मई 2017 तक ग्राहक ने कई बार ईमेल भेजे. आरबीआई से लेकर अन्य अधिकारियों तक शिकायत पहुंचाई. एसबीआई से सीसीटीवी फुटेज के लिए आरटीआई भी दाखिल की. लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं मिला. आखिरकार दिसंबर 2017 में उपभोक्ता फोरम का रुख किया. बैंक ने दलील दी कि एटीएम एसबीआई का था और लेन-देन सफल दिख रहा है, इसलिए जिम्मेदारी नहीं. फोरम ने इस तर्क को खारिज कर दिया.
आरबीआई नियमों का हवाला, बैंक पर जुर्माना
उपभोक्ता आयोग ने कहा कि आरबीआई के नियमों के अनुसार गड़बड़ी पर राशि पांच दिनों में वापस होनी चाहिए थी, जो बैंक ने नहीं की. बैंक को ठोस सबूत पेश करने को कहा गया, लेकिन वह नाकाम रहा. आयोग ने मूल 10,000 रुपये पर 9% सालाना ब्याज, देरी के लिए रोजाना 100 रुपये मुआवजा, मानसिक उत्पीड़न के लिए 3,000 रुपये और कानूनी खर्च के लिए 2,000 रुपये देने का आदेश दिया.
नौ साल बाद 3.28 लाख का मुआवजा
26 फरवरी 2026 तक देरी 3,288 दिन हो चुकी थी. रोजाना 100 रुपये के हिसाब से मुआवजा 3,28,800 रुपये पहुंच गया. कुल मिलाकर बैंक को मूल राशि से लगभग 30 गुना ज्यादा चुकाना पड़ रहा है. यह मामला ग्राहकों के अधिकारों और बैंकों की जिम्मेदारी का बड़ा उदाहरण बन गया है.
















