इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आज एक बड़ा फैसला सुनाया. जिसमें नैतिक दायित्व और कानूनी दायित्व के अंतर के बारे में बताया गया. कोर्ट ने एक बुजुर्ग दंपति की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने बेटे की मौत के बाद अपनी बहू से गुजारा भत्ता मांगा था. कोर्ट ने इसे कानूनी दायित्व मानने से इनकार कर दिया.
बुजुर्ग द्वारा दायर किए गए मामले पर अदालत ने यह फैसला सुनाया. यह जोड़ा पिछले साल अगस्त में फैमिली कोर्ट से निराश होकर हाई कोर्ट पहुंचा था. जिसमें उन्होंने बताया कि उनके बेटे की 2021 में मौत हो गई थी, बेटा उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल था.
गुजारा के लिए बेटे पर निर्भर थे माता-पिता
उन दोनों बुजुर्गों का कहना था कि बेटे की नौकरी बहू को लगी थी. वह अपने पूरे खर्चे के लिए अपने बेटे पर निर्भर थे. हालांकि बेटे की मौत के बाद बहू को नौकरी से जुड़े कई लाभ भी मिले हैं. लेकिन उन्होंने माता-पिता को नहीं दिया. वह उसमें से भरण-पोषण के लिए मदद चाहते थे.
इस मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस मदन पाल सिंह ने याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि बहू का सास-ससुर का भरण-पोषण करना सिर्फ नैतिक दायित्व है, इसे कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 के तहत केवल पत्नी, बच्चे और माता-पिता को ही गुजारा भत्ता मांगने का अधिकार है, सास-ससुर इस दायरे में नहीं आते.
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि कानून बनाने वालों ने अपनी समझदारी से सास-ससुर को इस प्रावधान में शामिल नहीं किया है. उनका इरादा बहू पर सास-ससुर के भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी डालने का नहीं था. बहू के वकील ने कहा कि फैमिली कोर्ट पहले ही इस मामले में फैसला दे चुका है.
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया, कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में कुछ भी ऐसा नहीं है जिससे साबित हो कि बहू को नौकरी अनुकंपा के आधार पर मिली थी. कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा कि नैतिक दायित्व चाहे कितना भी जरूरी क्यों न लगे, लेकिन कानूनी प्रावधान के अभाव में उसे कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं किया जा सकता. कानून में गुजारा भत्ता केवल विशिष्ट लोगों के मांगने का अधिकार बताया गया है.















