अंडमान में बनेगा भारत का पहला कोरल रीफ रिसर्च सेंटर, 120 करोड़ रुपये होगी लागत

भारत जल्द ही अंडमान-निकोबार में देश का पहला कोरल रीफ रिसर्च सेंटर स्थापित करेगा. यह केंद्र समुद्री जैवविविधता, संरक्षण और कोरल मॉनिटरिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और राष्ट्रीय स्तर पर अनुसंधान को दिशा देगा.

0
8

अंडमान और निकोबार की समुद्री दुनिया एक नए वैज्ञानिक अध्याय की तैयारी में है. केंद्र सरकार यहां नेशनल कोरल रीफ रिसर्च इंस्टीट्यूट (NCRRI) स्थापित करने जा रही है, जो पूरे देश में कोरल अनुसंधान का मुख्य केंद्र बनेगा.

120 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला यह संस्थान संरक्षण, अध्ययन और निगरानी में नई तकनीक और उन्नत सुविधाओं का इस्तेमाल करेगा. अधिकारियों का कहना है कि यह पहल न केवल कोरल रीफ संरक्षण को मजबूत करेगी, बल्कि जलवायु परिवर्तन से जूझते समुद्री पारितंत्रों को भी नई उम्मीद देगी.

अंडमान में देश का पहला कोरल अनुसंधान केंद्र

सरकार ने दक्षिण अंडमान के चिड़ियाटापू में NCRRI स्थापित करने का निर्णय लिया है. पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय इस अत्याधुनिक संस्थान की जिम्मेदारी संभालेगा. यह देशभर में कोरल रीफ से जुड़े शोध और मॉनिटरिंग गतिविधियों का केंद्र बिंदु बनेगा. अधिकारी बताते हैं कि यह पहल समुद्री संरक्षण के क्षेत्र में भारत की क्षमता को नई दिशा देगी.

कोरल रीफ क्यों हैं इतने महत्वपूर्ण

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ZSI के अधिकारी शिवपेरुमन ने बताया कि कोरल रीफ प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करते हैं. ये समुद्री तूफानों और ऊंची लहरों के नुकसान को कम करते हैं, जिससे तटीय इलाकों में जन-धन की हानि रोकने में मदद मिलती है. तेजी से बदलती जलवायु के बीच इनका अस्तित्व और भी महत्वपूर्ण हो गया है.

डिजिटल तकनीक से ज्ञान तक आसान पहुंच

ZSI म्यूजियम में जल्द ही QR कोड आधारित प्रणाली शुरू की जाएगी. इससे आगंतुक अपने मोबाइल फोन से प्रजातियों की तस्वीरें और उनसे जुड़ी वैज्ञानिक जानकारी आसानी से देख सकेंगे. अधिकारियों का कहना है कि यह डिजिटल सुविधा आम लोगों में समुद्री जैवविविधता के प्रति रुचि बढ़ाएगी.

बढ़ते समुद्री खतरे और जलवायु का प्रभाव

पूर्व निदेशक कैलाश चंद्र ने अंडमान को देश के चार प्रमुख जैवविविधता हॉटस्पॉट्स में से एक बताया. उन्होंने कहा कि समुद्र के बढ़ते स्तर और तापमान में वृद्धि ने कोरल रीफ के अस्तित्व पर बड़ा खतरा खड़ा कर दिया है. उन्होंने आगाह किया कि यदि संरक्षण के प्रयास समय पर नहीं बढ़ाए गए तो कई प्रजातियां हमेशा के लिए गायब हो सकती हैं.

वैज्ञानिकों और सुरक्षा बलों की सक्रिय भागीदारी

तीन दिवसीय कार्यशाला में भारतीय तटरक्षक, भारतीय सेना, INS जारावा और अंडमान पुलिस सहित कई एजेंसियों के 20 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. विशेषज्ञों ने द्वीपों की जैवविविधता और उसे सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक कदमों पर विस्तृत चर्चा की. अधिकारियों का कहना है कि स्थानीय प्रशासन और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच सहयोग से संरक्षण की प्रक्रिया और मजबूत होगी.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here