पिघलते आर्कटिक पर भारत की नजर, वैश्विक मंच पर पर्यावरण से रणनीति तक रखेगा पक्ष

0
24

नई दिल्ली: आर्कटिक को लेकर भारत की सक्रियता अब केवल वैज्ञानिक अनुसंधान तक सीमित नहीं रह गई है। जलवायु परिवर्तन, समुद्री बर्फ में बदलाव, पर्यावरणीय असर, ऊर्जा और कनेक्टिविटी जैसे मुद्दों के कारण ध्रुवीय क्षेत्र का महत्व लगातार बढ़ रहा है। इसी पृष्ठभूमि में विदेश राज्य मंत्री और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह 8 से 10 अक्टूबर 2026 तक आइसलैंड की राजधानी रेक्याविक में आयोजित होने वाली आर्कटिक सर्कल असेंबली में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे। भारत इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर जलवायु और पर्यावरण से जुड़े विषयों पर अपना दृष्टिकोण रखेगा। भारत पहले भी इस मंच में भाग लेता रहा है और सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 2024 में भी भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने रेक्याविक में हुई आर्कटिक सर्कल असेंबली में हिस्सा लिया था।

‘पिघलते ध्रुव’ पर भारत और सिंगापुर की चर्चा

सम्मेलन में कीर्ति वर्धन सिंह ‘मेल्टिंग पोल्स: पर्सपेक्टिव्स फ्रॉम इंडिया एंड सिंगापुर’ विषय पर होने वाले पूर्ण सत्र में शामिल होंगे। यह चर्चा इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि ध्रुवीय क्षेत्रों में बदलाव का असर केवल वहां के पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता। समुद्र का स्तर, मौसम के पैटर्न, जैव विविधता और वैश्विक जलवायु व्यवस्था से जुड़े प्रभाव दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंच सकते हैं। ऐसे में भारत अपनी चिंताओं के साथ-साथ वैज्ञानिक सहयोग और वैश्विक भागीदारी पर भी जोर दे सकता है।

ऑब्जर्वर देशों के नजरिए को सामने रखेगा भारत

भारत की ओर से आयोजित एक अलग सत्र में ‘आर्कटिक और जलवायु परिवर्तन: ऑब्जर्वर देशों का नजरिया’ विषय पर चर्चा होगी। इसमें भारत की भूमिका एक ऐसे देश की है जो आर्कटिक क्षेत्र का हिस्सा नहीं है, लेकिन वहां वैज्ञानिक और पर्यावरणीय गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी रखता है। भारत का हिमाद्री रिसर्च स्टेशन नॉर्वे के स्वालबार्ड क्षेत्र के न्य-ऑलेसंड में स्थित है और भारत ने वहां अपनी वैज्ञानिक मौजूदगी को लगातार मजबूत किया है।

आइसलैंड के साथ बातचीत भी अहम

रेक्याविक यात्रा के दौरान कीर्ति वर्धन सिंह की आइसलैंड के विदेश मंत्री के साथ द्विपक्षीय बातचीत भी प्रस्तावित है। दोनों देशों के बीच ध्रुवीय अनुसंधान के अलावा जियोथर्मल ऊर्जा, स्वच्छ ऊर्जा, मत्स्य पालन और तकनीकी सहयोग जैसे क्षेत्र भी महत्वपूर्ण हैं। आइसलैंड के साथ भारत के संबंधों में जलवायु और ऊर्जा सहयोग का हिस्सा पिछले वर्षों में बढ़ा है। रेक्याविक में होने वाली बातचीत इन क्षेत्रों में आगे के सहयोग की संभावनाओं पर केंद्रित हो सकती है।

भारत की आर्कटिक नीति के छह प्रमुख आधार

भारत की आर्कटिक नीति को छह व्यापक क्षेत्रों के आसपास विकसित किया गया है—वैज्ञानिक अनुसंधान, जलवायु और पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक गतिविधियां, कनेक्टिविटी, शासन तथा क्षमता निर्माण। इन क्षेत्रों का उद्देश्य आर्कटिक में भारत की वैज्ञानिक समझ बढ़ाने के साथ-साथ वहां होने वाले बदलावों को भारत के पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों से जोड़कर देखना है।

दुनिया की नजर इस सम्मेलन पर

आर्कटिक सर्कल असेंबली आर्कटिक मुद्दों पर चर्चा करने वाले प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मंचों में शामिल है। यहां राजनेताओं के साथ वैज्ञानिक, शोधकर्ता, कारोबारी और मूलनिवासी समुदायों के प्रतिनिधि भी हिस्सा लेते हैं। जलवायु परिवर्तन, समुद्री बर्फ में कमी, क्षेत्रीय शासन, सुरक्षा, भू-राजनीति और टिकाऊ विकास जैसे विषय सम्मेलन की चर्चाओं में प्रमुख रहते हैं। भारत के लिए यह मंच अपने वैज्ञानिक अनुभव और जलवायु संबंधी चिंताओं को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने रखने का अवसर है। साथ ही आर्कटिक में बदलती परिस्थितियों को भारत की दीर्घकालिक पर्यावरणीय, वैज्ञानिक और कनेक्टिविटी प्राथमिकताओं से जोड़कर देखने का रास्ता भी खुलता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here