नई दिल्ली: उत्तर-पूर्व की संवेदनशील सीमाओं पर एक बार फिर भू-राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। भारत और म्यांमार के बीच दशकों से अनसुलझे सीमा विवाद को सुलझाने के लिए जमीन की अदला-बदली के संभावित विकल्प पर विचार किए जाने की खबरें सामने आ रही हैं। इस अंतरराष्ट्रीय कदम की आहट मिलते ही मणिपुर के राजनीतिक और नागरिक समूहों में कड़ा विरोध देखने को मिल रहा है, जिससे इलाके में तनाव का नया दौर शुरू होने की आशंका जताई जा रही है। भारत सरकार ने वर्ष 2024 में 2018 से लागू ‘फ्री मूवमेंट रिजीम’ (FMR) को समाप्त कर दिया था। FMR के तहत सीमा के दोनों ओर रहने वाले जनजातीय समुदायों को बिना वीजा के 16 किलोमीटर तक आवाजाही की छूट मिलती थी।
डिप्लोमैट की रिपोर्ट
सीमा को लेकर यह विवाद अमेरिकी पत्रिका ‘द डिप्लोमैट’ की एक रिपोर्ट के बाद चर्चा में आया। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार मणिपुर सीमा पर बॉर्डर पिलर 65 से 68 के बीच फैले 2.8 किलोमीटर लंबे अनसुलझे हिस्से को अंतिम रूप देने के लिए लगभग 1.4 वर्ग मील जमीन की अदला-बदली के प्रस्ताव की जांच कर रही है।
जब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से इस संबंध में सवाल पूछा गया, तो उन्होंने अदला-बदली के प्रस्ताव की सीधे पुष्टि तो नहीं की, लेकिन यह स्वीकार जरूर किया कि सीमा के कुछ हिस्सों का सीमांकन अभी बाकी है और उन पर बातचीत जारी है।
1,643 किलोमीटर लंबी सीमा की भौगोलिक चुनौती
भारत और म्यांमार के बीच कुल 1,643 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा होती है। यह सीमा भारत के चार राज्यों, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से होकर गुजरती है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, करीब 1,472 किलोमीटर हिस्से का सीमांकन बॉर्डर पिलर्स के जरिए किया जा चुका है, जबकि लगभग 171 किलोमीटर का इलाका अब भी अनसुलझा है। यह अनसुलझा हिस्सा मुख्य रूप से अरुणाचल प्रदेश के लोहित सेक्टर और मणिपुर की काबाव घाटी से जुड़ा हुआ है। सीमा का बड़ा हिस्सा दुर्गम पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा हुआ है, जहां दोनों देशों की तरफ एक ही जातीय समुदाय के लोग रहते आए हैं।
मणिपुर में क्षेत्रीय अखंडता को लेकर कड़ा विरोध
जमीन की अदला-बदली की खबरों ने मणिपुर के स्थानीय संगठनों को बेहद सतर्क और आक्रामक कर दिया है। मणिपुर के नागरिक सामाजिक संगठन ‘कोकोमी’ (COCOMI) ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि राज्य की भौगोलिक अखंडता के साथ किसी भी तरह का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। स्थानीय समूहों का कहना है कि मणिपुर इतिहास में पहले ही काबाव घाटी जैसी अपनी महत्वपूर्ण जमीन खो चुका है, ऐसे में जनता की सहमति के बिना राज्य का एक इंच हिस्सा भी म्यांमार को देना राज्य की भावनाओं से खिलवाड़ करने जैसा होगा।












