भारत पर 100% टैरिफ की तैयारी के बीच ट्रंप के सलाहकार का बड़ा बयान, कहा- PM मोदी और ट्रंप खुद सुलझा लेंगे मामला

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US tariff
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नई दिल्ली: रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका की सख्ती के बीच भारत को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है. अमेरिका में रूस के शीर्ष तेल खरीदारों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की तैयारी है. इस बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारो ने भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर नरम रुख दिखाया है.

व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान नवारो ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच अच्छे कामकाजी संबंध हैं. उन्होंने कहा कि दोनों नेता इस मुद्दे को आपस में सुलझा सकते हैं और उनके बीच किसी तीसरे पक्ष का दखल उचित नहीं होगा. नवारो ने अपनी करीब छह से आठ महीने पुरानी एक रिपोर्ट का भी जिक्र किया. उन्होंने दावा किया कि यूक्रेन युद्ध से पहले भारत रूस से तेल कारोबार में इस तरह शामिल नहीं था, लेकिन युद्ध के बाद भारत ने रूसी तेल से बने रिफाइंड उत्पादों का व्यापार बढ़ाया. उनके मुताबिक, इससे रूस की युद्ध क्षमता को आर्थिक मदद मिली.

अमेरिकी सीनेट ने पारित किया बड़ा बिल

दरअसल, 7 अगस्त को अमेरिकी सीनेट ने एक अहम विधेयक को मंजूरी दी. इसे 86-11 वोट से पारित किया गया. इस कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले शीर्ष पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है. भारत और चीन इन देशों में शामिल हैं. ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’ का मकसद रूस और ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है. प्रस्ताव में तर्क दिया गया है कि रूस से ऊर्जा खरीद उसके राजस्व को मजबूत करती है, जिसका इस्तेमाल यूक्रेन में जारी सैन्य अभियान के लिए किया जा सकता है.

पुतिन और रूसी तेल कारोबार पर भी सख्ती

इस विधेयक में केवल तेल खरीदने वाले देशों को निशाना नहीं बनाया गया है. इसमें रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, वरिष्ठ राजनीतिक और सैन्य अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों तथा ऊर्जा परियोजनाओं पर नए प्रतिबंधों का भी प्रावधान है. इसके अलावा ऐसे पुराने और दूसरे झंडे के तहत चलने वाले तेल टैंकरों पर कार्रवाई बढ़ाने की बात कही गई है, जिनका इस्तेमाल प्रतिबंधों से बचकर रूस के लिए ऊर्जा से कमाई करने में किया जाता है.

भारत के लिए क्यों अहम है रूसी तेल?

भारत ने 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई थी. इससे भारतीय रिफाइनरियों को कम कीमत पर कच्चा माल मिला और देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिली. अमेरिकी प्रस्ताव के तहत भारत के सामने सस्ता रूसी तेल खरीदने और अमेरिकी बाजार तक पहुंच बनाए रखने के बीच चुनौती खड़ी हो सकती है. हालांकि, फिलहाल नवारो के बयान से संकेत मिला है कि भारत और अमेरिका के बीच इस मुद्दे को बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश की जा सकती है.

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