नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले होने वाला विधान परिषद का चुनाव इस बार बेहद अहम हो गया है। शिक्षक और स्नातक कोटे की महज 11 सीटों के लिए भाजपा और सपा दोनों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा के लिए खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कमान संभाल ली है। वहीं अपने प्रत्याशियों को जिताने के लिए सीएम लगातार जनसभाएं कर रहे हैं।
बता दें, चार दिनों में यह उनकी चौथी जनसभा होगी। सोमवार को गोरखपुर, मंगलवार को बरेली और बुधवार को वाराणसी में सीएम ने प्रचार किया, आज मिर्जापुर में जनसभा की। वहीं सपा भी पीछे नहीं है। अखिलेश यादव ने भी आखिरी समय में दो प्रत्याशियों को बदलकर यह संकेत दे दिया है कि यह चुनाव उनके लिए भी कितना महत्वपूर्ण है। सपा के नेता और पदाधिकारी भी जिलों में डटे हुए हैं। पहली बार दोनों ही दलों की तरफ से एमएलसी चुनाव को लेकर इतनी गंभीरता दिख रही है, जिसके पीछे तीन बड़ी वजहें हैं।
भाजपा-सपा के लिए क्यों है प्रतिष्ठा का सवाल
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से सपा का आत्मविश्वास बढ़ा हुआ है और वह भाजपा पर मनोवैज्ञानिक बढ़त में है। विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा इस बढ़त को तोड़ना चाहती है, इसलिए एमएलसी चुनाव जीतना उसके लिए जरूरी हो गया है। पिछली बार भाजपा ने 11 में से 6 सीटें जीती थीं, इस बार लक्ष्य इससे ज्यादा है। वहीं सपा लोकसभा वाले माहौल को विधानसभा तक बरकरार रखना चाहती है।
तीन कारण जो इसे बनाते हैं खास
1. बैलेट पेपर से चुनाव: यह चुनाव ईवीएम से नहीं, बल्कि बैलेट पेपर से होगा। अगर भाजपा जीती तो वह विपक्ष के ईवीएम वाले आरोपों को खारिज कर सकेगी। वहीं सपा जीती तो वह ईवीएम के मुद्दे को और हवा देगी।
2. पढ़े-लिखे वोटर: इस चुनाव के वोटर सिर्फ शिक्षक और स्नातक हैं, यानी समाज का पढ़ा-लिखा वर्ग। इनका समर्थन मिलना किसी भी पार्टी के लिए बड़ी बात मानी जाएगी।
3. पूरे यूपी का कवरेज: भले सीटें 11 हैं, लेकिन इनका दायरा पूरे प्रदेश के 75 जिलों तक फैला है। इसलिए इसे विधानसभा चुनाव का मूड टेस्ट भी माना जा रहा है।
किन सीटों पर हो रहा है चुनाव
कुल 11 सीटों में 5 स्नातक और 6 शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की हैं। स्नातक में लखनऊ, वाराणसी, आगरा, मेरठ और इलाहाबाद-झांसी सीटें शामिल हैं। शिक्षक कोटे में लखनऊ, वाराणसी, आगरा, मेरठ, बरेली-मुरादाबाद और गोरखपुर-फैजाबाद सीटें हैं। इन सीटों के जरिए पूर्व से पश्चिम तक पूरा प्रदेश कवर हो रहा है, जिससे यह चुनाव विधानसभा से पहले का लिटमस टेस्ट बन गया है।











