अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में बहुमत बनाए रखना राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के लिए इस बार आसान चुनौती नहीं है। देश में होने वाले मिडटर्म चुनावों का पुराना रिकॉर्ड सत्ताधारी दल के पक्ष में बहुत उत्साहजनक नहीं रहा है। वर्ष 1946 से 2022 तक आयोजित 20 ऐसे चुनावों के आंकड़ों के मुताबिक, 18 मौकों पर राष्ट्रपति की पार्टी को प्रतिनिधि सभा में अपनी सीटें गंवानी पड़ीं। इन चुनावों में औसतन 26 सीटों का नुकसान दर्ज किया गया। इस बार मतदाता प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 100 में से 35 सीटों के लिए अपना फैसला सुनाएंगे। राष्ट्रपति का नाम सीधे मतदान पत्र पर नहीं होगा, लेकिन नतीजे यह तय करेंगे कि अगले दो वर्षों में कांग्रेस के भीतर ट्रंप को कितना समर्थन मिलेगा।
सत्ता में रहने वाली पार्टी के सामने दो साल बाद क्यों आती है मुश्किल
अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल चार वर्षों का होता है, जबकि संसद के चुनाव हर दो साल के अंतराल पर कराए जाते हैं। राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच होने वाले इस मतदान को मिडटर्म इलेक्शन कहा जाता है। इस दौरान जनता सरकार के फैसलों, आर्थिक हालात, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रिया देती है। सत्ता में आने के बाद शुरुआती दो वर्षों में सरकार के कामकाज का असर लोगों के सामने आने लगता है। असंतुष्ट मतदाता कई बार विपक्ष को समर्थन देकर संसद में सत्ता का संतुलन बदल देते हैं। इसी प्रवृत्ति को अमेरिकी राजनीति में ‘मिडटर्म पेनल्टी’ के नाम से जाना जाता है।
इतिहास में केवल दो बार राष्ट्रपति की पार्टी को मिला फायदा
1946 से 2022 के बीच हुए 20 चुनावों में सिर्फ दो अवसर ऐसे रहे, जब राष्ट्रपति के दल ने प्रतिनिधि सभा में अपनी स्थिति बेहतर की। वर्ष 1998 में बिल क्लिंटन की डेमोक्रेटिक पार्टी को चार अतिरिक्त सीटें मिली थीं। इसके बाद 2002 में जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के नेतृत्व वाली रिपब्लिकन पार्टी ने आठ सीटों का इजाफा किया। बाकी 18 चुनावों में सत्ताधारी दल को नुकसान उठाना पड़ा। बराक ओबामा के कार्यकाल में 2010 का चुनाव सबसे बड़े झटकों में शामिल रहा, जब डेमोक्रेटिक पार्टी ने 64 सीटें खो दीं। 1946 में हैरी ट्रूमैन के समय भी डेमोक्रेट्स को 56 सीटों का नुकसान हुआ था। 1994 में बिल क्लिंटन की पार्टी ने 54 सीटें गंवाई थीं।
रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दलों के नुकसान में अंतर
पिछले कई दशकों के आंकड़ों में डेमोक्रेटिक राष्ट्रपतियों की पार्टियों को प्रतिनिधि सभा में औसतन 29 सीटें गंवानी पड़ीं। रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों के समय यह औसत लगभग 23 सीटों का रहा। रिपब्लिकन दल के लिए सबसे खराब प्रदर्शन 1958 में दर्ज हुआ, जब ड्वाइट आइजनहावर के कार्यकाल में उसे 50 सीटों का नुकसान हुआ। वहीं 2018 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान पार्टी ने 42 सीटें गंवाई थीं। हालांकि उस समय सीनेट में रिपब्लिकन दल की स्थिति मजबूत हुई थी।
सीनेट के नतीजों में भी सत्ताधारी दल को मिलते रहे झटके
सीनेट के चुनावों में भी राष्ट्रपति की पार्टी को लगातार नुकसान का सामना करना पड़ा है। 1946 से 2022 के बीच 20 मिडटर्म चुनावों में 13 बार सत्ताधारी दल की सीटें कम हुईं। हालांकि यहां नुकसान का असर प्रतिनिधि सभा से अलग होता है, क्योंकि हर दो साल में सीनेट की सभी सीटों पर मतदान नहीं होता। 100 सदस्यों वाले इस सदन में सामान्य तौर पर करीब एक-तिहाई सीटों के लिए चुनाव कराया जाता है। सीनेटर का कार्यकाल छह वर्ष का होता है। 1958 में रिपब्लिकन पार्टी ने सीनेट की 13 सीटें गंवाई थीं, जबकि 1946 में डेमोक्रेटिक दल को 12 सीटों का नुकसान हुआ था।
कांग्रेस पर विपक्ष का नियंत्रण हुआ तो ट्रंप के सामने क्या होगा?
प्रतिनिधि सभा या सीनेट में विपक्ष को बहुमत मिलने से राष्ट्रपति की नीतियों को आगे बढ़ाना कठिन हो सकता है। कानून बनाने के लिए दोनों सदनों की मंजूरी जरूरी होती है, इसलिए विपक्ष विधायी प्रस्तावों में रुकावट डाल सकता है। प्रतिनिधि सभा में बहुमत रखने वाला दल राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया भी शुरू कर सकता है। दूसरी ओर सीनेट में बहुमत न्यायिक नियुक्तियों और अन्य अहम नामांकनों पर प्रभाव डालता है। उपलब्ध चुनावी गणना के अनुसार, डेमोक्रेटिक पार्टी को प्रतिनिधि सभा में बहुमत पाने के लिए तीन और सीनेट में चार अतिरिक्त सीटों की आवश्यकता है। सीनेट में बराबरी की स्थिति बनने पर उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस निर्णायक मत दे सकते हैं। इसलिए 3 नवंबर का फैसला ट्रंप के आगामी दो वर्षों के शासन और कांग्रेस के साथ उनके संबंधों की दिशा तय करने में अहम होगा।












