चंडीगढ़: पंजाब में नशे के दुष्परिणामों से निपटने और भावी पीढ़ी को सुरक्षा कवच प्रदान करने की दिशा में एक बड़ा वैचारिक बदलाव देखने को मिल रहा है। राज्य सरकार ने युवाओं में नशीले पदार्थों के प्रति पनपने वाले शुरुआती भ्रम को तोड़ने के लिए ‘स्कूल नशेआँ विरुद्ध’ नामक विशेष साक्ष्य-आधारित पाठ्यक्रम की शुरुआत की है। इस दूरदर्शी पहल का मुख्य उद्देश्य युवाओं को नशे के जाल में फंसने से पहले ही इसके वैज्ञानिक और व्यावहारिक पहलुओं से अवगत कराना है, ताकि कोई भ्रम आगे चलकर आदत न बन सके।
वैश्विक शोध और साक्ष्यों पर आधारित रणनीति
यह पाठ्यक्रम केवल नैतिक शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के गहन शोध के आधार पर तैयार किया गया है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के ‘सीईजीए’ (CEGA) और नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी व एस्थर डुफ्लो द्वारा स्थापित शोध संस्था ‘जे-पाल’ (J-PAL) के सहयोग से इसे आकार दिया गया है। यह अध्ययन मुख्य रूप से ओपिओइड्स (अफ़ीम व हेरोइन जैसे गंभीर पदार्थों) के खतरे को कम आंकने की मानवीय प्रवृत्ति पर प्रहार करता है। अक्सर किशोरावस्था में नशीले पदार्थों के प्रति जिज्ञासा ही आगे चलकर जीवनभर की निर्भरता का कारण बन जाती है। ऐसे में यह कार्यक्रम समस्या उत्पन्न होने से पहले ही उसकी जड़ पर वार करता है।
युवाओं की छह मुख्य खतरनाक भ्रांतियों पर सीधा प्रहार
अभियान के तहत युवाओं के भीतर घर कर चुकी छह प्रमुख ख़तरनाक धारणाओं को लक्षित किया गया है।
• ‘एक बार आजमाने’ का भ्रम: पहली भ्रांति यह रहती है कि हेरोइन या ‘चिट्टा’ को केवल एक बार आज़माने से लत नहीं लगती, जबकि वास्तविकता यह है कि यह पहली ही बार में गंभीर शारीरिक निर्भरता पैदा कर सकता है।
• केवल इच्छाशक्ति का मामला: दूसरी भ्रांति यह है कि इंसान जब चाहे अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इसे छोड़ सकता है, जबकि एक बार न्यूरोलॉजिकल निर्भरता बनने के बाद इसे बिना चिकित्सीय मदद के छोड़ना बेहद कठिन होता है।
• रिहैबिलिटेशन का मिथक: तीसरी गलतफहमी यह है कि रिहैबिलिटेशन (पुनर्वास) केंद्र में जाने से व्यक्ति तुरंत और स्थायी रूप से ठीक हो जाएगा, जबकि नशा मुक्ति एक अनवरत प्रक्रिया है जिसमें दोबारा भटकने का जोखिम बना रहता है।
• ‘हल्के’ नशों को सुरक्षित समझना: चौथी भ्रांति हल्के नशों को लेकर है; युवा तंबाकू, शराब या डॉक्टर द्वारा लिखी दवाओं को सुरक्षित मानते हैं, जबकि यही आगे चलकर गंभीर नशों का प्रवेश द्वार बनते हैं।
• नियमित सेवन का इरादा: पाँचवाँ भ्रम यह है कि लत का शिकार व्यक्ति शुरुआत से ही नियमित नशा करने का इरादा रखता है, जबकि इसकी शुरुआत तनाव या साथियों के दबाव में अस्थायी प्रयोग से होती है।
• सीमित नुकसान की धारणा: छठी भ्रांति यह है कि इसका नुकसान सिर्फ नशा करने वाले को होता है, जबकि इसका दुष्प्रभाव पूरे परिवार और समाज के ताने-बाने को प्रभावित करता है।
सामाजिक संवाद की दिशा बदलने का प्रयास
पंजाब के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. बलबीर सिंह के अनुसार, यह रणनीति नशे पर होने वाली सामाजिक बातचीत का रुख बदलने की गंभीर कोशिश है। अब तक बातचीत तब शुरू होती थी जब व्यक्ति पूरी तरह लत की चपेट में आ चुका होता था। इस अभियान का ध्येय उस क्षण को पकड़ना है, जब कोई युवा पहली बार सुनता है।”एक बार लेकर देखो, कुछ नहीं होगा।” उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट है: भ्रम को आदत बनने से पहले तोड़ना और प्रयोग को निर्भरता में बदलने से रोकना।
ग्राउंड लेवल पर दिखा बदलाव और व्यावहारिक लाभ
अमृतसर के छेहरटा स्थित ‘स्कूल ऑफ एमिनेंस’ की नोडल शिक्षिका अमनदीप कौर के अनुसार, इस पाठ्यक्रम से विद्यार्थियों के दृष्टिकोण में दो बड़े बदलाव आए हैं। पहला, उन्हें नशे के जीवविज्ञान को समझने के लिए वैज्ञानिक शब्दावली और तथ्य मिले हैं, जिससे वे समझ पा रहे हैं कि नशीले पदार्थ मस्तिष्क और शरीर को कैसे प्रभावित करते हैं। दूसरा, उन्हें वास्तविक जीवन में दोस्तों के दबाव का सामना करने और दृढ़ता से ‘ना’ कहने की व्यावहारिक रणनीतियाँ समझ में आई हैं, जिससे उनके आत्मविश्वास में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।












