नई दिल्ली: सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच शुक्रवार को हि नया रक्षा समझौता हुआ था कि तुर्की के ताजा बयान ने तीनों देशों की आपसी साझेदारी को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने साफ किया है कि यह समझौता ईरान या किसी दूसरे देश के खिलाफ बनाया गया गठबंधन नहीं है. फिदान ने शनिवार को कहा कि तीनों देशों का मकसद किसी खास देश को निशाना बनाना नहीं, बल्कि क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता को मजबूत करना है. उनके बयान से यह भी स्पष्ट हुआ कि समझौते का मतलब यह नहीं है कि एक सदस्य पर हमला होते ही बाकी दोनों देश अपने आप युद्ध में उतर जाएंगे.
दरअसल, शुक्रवार को सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ पर हस्ताक्षर किए थे. समझौते में तीनों देशों के बीच आपसी रक्षा सहयोग बढ़ाने की बात कही गई है. यह डील ऐसे समय में हुई है जब मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के बीच ईरान ने कई बार सऊदी अरब की ओर मिसाइलें दागी थीं. जिसे लेकर ईरान का कहना था कि ये हमले केवल खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर किए गए थे.
क्या एक पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा?
इस समझौते को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा उस प्रावधान की है, जिसके तहत किसी सदस्य पर हमला होने की स्थिति में बाकी देशों से सहयोग की उम्मीद की गई है. इसी वजह से इसे ‘इस्लामिक NATO’ भी कहा जा रहा है. हालांकि, तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने सरकारी समाचार एजेंसी ‘अनादोलु एजेंसी’ को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि तीनों देशों ने किसी साझा दुश्मन का नाम तय नहीं किया है.
फिदान के मुताबिक, कोई भी देश तब तक उनका दुश्मन नहीं माना जाएगा, जब तक वह इन तीनों में से किसी के खिलाफ हमला या कोई शत्रुतापूर्ण कार्रवाई नहीं करता. उन्होंने यह भी कहा कि समझौते में ऐसा कुछ लिखित तौर पर मौजूद नहीं है, जो किसी खास देश को साझा खतरे के रूप में घोषित करता हो.
मदद के लिए औपचारिक अनुरोध जरूरी
फिदान ने आपसी रक्षा से जुड़ी इस व्यवस्था की तुलना NATO के अनुच्छेद 5 से की, लेकिन बताया कि किसी सदस्य को सहायता के लिए औपचारिक अनुरोध करना होगा. इसके बाद मदद का स्तर हालात के अनुसार तय किया जाएगा. सहायता में खुफिया जानकारी साझा करने, लॉजिस्टिक्स सहयोग देने से लेकर जरूरत पड़ने पर सैन्य बल भेजने तक के विकल्प शामिल हो सकते हैं. यानी हर स्थिति में सैन्य कार्रवाई जरूरी नहीं होगी.
दूसरे देश भी जुड़ सकते हैं
फिदान ने बताया कि कुछ अन्य देशों ने भी इस समझौते में शामिल होने की इच्छा जताई है. हालांकि उन्होंने किसी देश का नाम नहीं बताया. उन्होंने उम्मीद जताई कि मिस्र अगले चरण में इस व्यवस्था का हिस्सा बन सकता है. समझौते के तहत तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री सैन्य प्रमुखों के साथ नियमित बैठकें करेंगे. इसके अलावा सऊदी अरब में एक साझा सचिवालय भी बनाया जाएगा, जो इस रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने का काम करेगा.
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की की सैन्य ताकत को देखते हुए इस समझौते को काफी अहम माना जा रहा है. पाकिस्तान परमाणु शक्ति संपन्न देश है, जबकि तुर्की NATO का सदस्य है और उसके पास गठबंधन की दूसरी सबसे बड़ी सेना है. तुर्की का ड्रोन और रक्षा उद्योग भी तेजी से मजबूत हुआ है.












