नई दिल्ली: देशभर में दशहरे पर रावण के पुतले को जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है, लेकिन राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में एक गांव ऐसा भी है जहां रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि उसका वध किया जाता है। भीलवाड़ा के शाहपुरा क्षेत्र के रोपा गांव में दशहरा मनाने का तरीका बिल्कुल अलग है। यहां गांव के बीचों-बीच रावण की 10 फुट ऊंची सीमेंट की स्थायी प्रतिमा लगी है। यह प्रतिमा करीब 100 साल पुरानी बताई जाती है। इसे हर साल जलाने के लिए नहीं बनाया गया था। गांव के लोग दशहरा से पहले इस प्रतिमा को नए रंगों से सजाते हैं और फिर एक अनोखी परंपरा निभाते हैं।
कैसे किया जाता है रावण दहन
यहां आग से नहीं, बल्कि धनुष-बाण से रावण वध किया जाता है। दशहरे के दिन पूरा गांव रावण चौक पर इकट्ठा होता है। गांव के बच्चे और युवा रामायण के किरदारों के वेश में आते हैं। राम के वेश में सजा एक बच्चा धनुष-बाण से रावण वध की लीला करता है। इस अनोखे नजारे को देखने के लिए आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। इसी परंपरा के कारण रोपा गांव को अब “रावण का गांव” भी कहा जाने लगा है।
दो दिन तक चलता है उत्सव
रोपा में दशहरे का आयोजन दो दिन तक होता है। दशहरा से एक दिन पहले गांव में लंका दहन किया जाता है। भगवान चारभुजा नाथ मंदिर से ठाकुर जी की शोभायात्रा निकाली जाती है। इसके बाद राम और लक्ष्मण की भूमिका के लिए गांव के युवाओं से आवेदन लिए जाते हैं। हनुमान जी के वेश में सजे बाल कलाकार लंका दहन का मंचन करते हैं। अगले दिन विजयादशमी पर मुख्य कार्यक्रम होता है, जहां राम के वेश में युवा रावण का प्रतीकात्मक वध करते हैं।
विद्वान के रूप में पूजा
गांव के पंडित सत्यनारायण शर्मा बताते हैं कि रोपा में रावण को सिर्फ खलनायक नहीं, बल्कि एक महान विद्वान के रूप में देखा जाता है। इसलिए उसे जलाकर राख नहीं किया जाता। ग्रामीण उसकी प्रतिमा का सम्मान करते हैं। गांव वालों का मानना है कि रावण की प्रतिमा पर मांगी गई मन्नतें पूरी होती हैं। कई लोग अपने कष्टों से राहत पाने के लिए यहां आते हैं। ग्रामीण एक किस्सा सुनाते हैं कि एक बार इलाके में भयंकर सूखा पड़ा था, तो लोगों ने रावण चौक पर पूरी रात जागरण किया और सुबह तक भारी बारिश हो गई। तभी से लोगों की आस्था और बढ़ गई। इस तरह रोपा गांव में दशहरा आज भी बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है, लेकिन उसका तरीका स्थानीय आस्था और 100 साल पुरानी परंपरा से जुड़ा है।












