Lithium-ion को मिलेगी टक्कर? 4 मिनट में चार्ज होने वाली सोडियम बैटरी पर बड़ा दावा

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Will Lithium ion face competition Bold claim regarding a sodium battery that charges in 4 minutes
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नई दिल्ली: बैटरी तकनीक के क्षेत्र में एक बड़ा दावा सामने आया है. चीन के वैज्ञानिकों ने ऐसी नई सोडियम मेटल बैटरी विकसित करने का दावा किया है, जो महज चार मिनट में पूरी तरह चार्ज हो सकती है. शोधकर्ता का कहना है कि यह बैटरी तेज चार्जिंग के साथ लंबे समय तक अपनी क्षमता भी बनाए रखने में सक्षम है. हालांकि, यह तकनीक अभी शुरुआती शोध चरण में है और आम उपभोक्ताओं तक पहुंचने में अभी समय लग सकता है.

स्मार्टफोन में किन बैटरी किया जाता है उपयोग 

आज दुनिया भर में स्मार्टफोन, लैपटॉप और इलेक्ट्रिक वाहनों में मुख्य रूप से लिथियम-आयन बैटरियों का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन लिथियम की सीमित उपलब्धता और बढ़ती कीमतों के कारण वैज्ञानिक लंबे समय से इसका सस्ता और सुरक्षित विकल्प तलाश रहे हैं. इसी दिशा में सोडियम आधारित बैटरी को भविष्य की संभावनाओं वाली तकनीक माना जा रहा है.

लिथियम की जगह होगा सोडियम का उपयोग 

नई रिसर्च के अनुसार, इस बैटरी में लिथियम की जगह सोडियम का उपयोग किया गया है, जो आसानी से उपलब्ध होने के साथ अपेक्षाकृत कम लागत की भी होगी. वैज्ञानिकों ने इसके लिए एक विशेष क्वासी-सॉलिड जेल इलेक्ट्रोलाइट विकसित किया है, जो बैटरी के भीतर बनने वाले डेंड्राइट्स को रोकता है. डेंड्राइट्स धातु के नुकीले कण होते हैं, जो शॉर्ट सर्किट और बैटरी खराब होने का कारण बन सकते हैं.

तेजी से चार्ज होगी 

शोधकर्ताओं का दावा है कि इस तकनीक की मदद से बैटरी न केवल तेज़ी से चार्ज होती है, बल्कि अधिक सुरक्षित भी रहती है. लैब परीक्षणों में यह बैटरी हजारों घंटे तक बिना किसी शॉर्ट सर्किट के सफलतापूर्वक काम करती रही. वहीं करीब 2,000 चार्जिंग साइकिल के बाद भी इसकी लगभग 90 प्रतिशत क्षमता बरकरार रही.

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल यह तकनीक लिथियम-आयन बैटरियों की जगह लेने के लिए तैयार नहीं है. इसकी एनर्जी डेंसिटी अभी ट्रेडिशनल लिथियम बैटरियों से कम है, इसलिए स्मार्टफोन और लंबी दूरी तय करने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों में इसका उपयोग शुरू होने में समय लग सकता है.

कब मार्किट में आएंगी ये बैटरियां 

फिलहाल यह तकनीक शोध प्रयोगशालाओं तक सीमित है. वैज्ञानिकों का मानना है कि बड़े पैमाने पर उत्पादन, विभिन्न मौसमों में परीक्षण और सुरक्षा मानकों पर खरा उतरने के बाद ही इसे बाजार में उतारा जा सकेगा. अगर आगे के परीक्षण सफल रहे तो आने वाले वर्षों में यह तकनीक इलेक्ट्रिक वाहनों, ऊर्जा भंडारण प्रणालियों और कई अन्य क्षेत्रों में बड़ा बदलाव ला सकती है.

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