नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक दबावों और वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं के बीच भारत सरकार ने अपनी ऊर्जा नीति को लेकर एक बेहद कड़ा और रणनीतिक रुख अपनाया है। अमेरिकी कांग्रेस में रूस और ईरान पर नकेल कसने के लिए एक नया कड़ा कानून पारित किए जाने के तुरंत बाद, नई दिल्ली ने स्पष्ट कर दिया है कि देश के आर्थिक हित और नागरिकों की ऊर्जा ज़रूरतें उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता हैं। इस विधायी घटनाक्रम के सामने आते ही भारतीय विदेश मंत्रालय और सरकार के शीर्ष सूत्रों ने वैश्विक समुदाय को यह संदेश दे दिया है कि भारत बाहरी दबाव में आकर अपनी नीतियों में कोई बदलाव नहीं करेगा।
1.4 अरब लोगों की ज़रूरतें पहली प्राथमिकता
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा और सीनेट से पारित इस विवादित विधेयक में राष्ट्रपति को यह शक्ति दी गई है कि वे रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर शत-प्रतिशत तक भारी टैरिफ लगा सकें।
इस कानून के केंद्र में भारत और चीन जैसे बड़े देश हैं जो रूसी ऊर्जा स्रोतों के बड़े खरीदार रहे हैं।
वैश्विक बाजार और द्विपक्षीय संबंधों पर असर की चेतावनी
वाशिंगटन में जारी इन गतिविधियों पर पैनी नजर रखते हुए भारत ने दोहराया है कि डेढ़ अरब से अधिक आबादी वाले देश की ऊर्जा आपूर्ति को अबाध रखना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। इसके लिए भारत किसी एक क्षेत्र पर निर्भर न रहकर विविध वैश्विक स्रोतों से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदता रहेगा।
भारत ने अमेरिकी प्रशासन के साथ हुई उच्चस्तरीय वार्ताओं में इस बात को पूरी तरह साफ कर दिया है कि ऐसे एकतरफा प्रतिबंध न केवल भारत और अमेरिका के मजबूत होते आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं, बल्कि संपूर्ण वैश्विक ऊर्जा बाजार में भी भारी अस्थिरता पैदा कर सकते हैं। भारतीय अधिकारियों ने अमेरिकी पक्ष को आगाह किया है कि आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी प्रकार की बाधा से तेल की वैश्विक कीमतों में उछाल आ सकता है, जिसका खामियाजा पूरे विश्व को भुगतना पड़ेगा।
देश के आर्थिक हितों की रक्षा का संकल्प
आगे आने वाली संभावित चुनौतियों से निपटने के लिए भारत सरकार ने देश के प्रमुख व्यापारिक और औद्योगिक संगठनों के साथ मिलकर काम करना शुरू कर दिया है। सरकार इस कानून के संभावित दुष्प्रभावों का गहन मूल्यांकन कर रही है ताकि देश के निर्यात और आर्थिक विकास को सुरक्षित रखा जा सके। अब यह कानून अंतिम स्वीकृति और हस्ताक्षर के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति के पास लंबित है। भारत का यह आत्मनिर्भर और निर्भीक रुख इस बात का प्रमाण है कि वैश्विक भू-राजनीति के बदलते दौर में भी देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करने वाला है।












