'हीरो कभी जेल नहीं जाता', क्या विजय सालगांवकर इस बार भी कानून को देगा चकमा? दृश्यम द कंक्लूजन देखने से पहले जरूर पढ़ें ये रिव्यू

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नई दिल्ली: दृश्यम’ फ्रेंचाइजी ने हमेशा दर्शकों को एक ऐसे खेल का हिस्सा बनाया है, जहां सच सामने होते हुए भी उसे साबित करना आसान नहीं होता। विजय सालगांवकर हर बार अपनी समझदारी से पुलिस को मात देता आया है। ऐसे में ‘दृश्यम: द कंक्लूजन’ से उम्मीद थी कि यह कहानी को ऐसा अंत देगी, जिसे दर्शक लंबे समय तक याद रखेंगे। फिल्म कई जगह उम्मीदों पर खरी उतरती है, लेकिन आखिरी पड़ाव पर थोड़ी कमजोर पड़ जाती है। कहानी पिछली फिल्म की घटनाओं के छह महीने बाद शुरू होती है। विजय और उसका परिवार सामान्य जिंदगी में लौटने की कोशिश कर रहा है, लेकिन पुराने मामले का डर अब भी उनके साथ है।

तभी राजवीर सिंह तोमर की एंट्री होती है। जयदीप अहलावत द्वारा निभाया गया यह पुलिस अधिकारी पुराने केस को नए सिरे से देखने लगता है। कुछ नए सबूत सामने आते हैं और विजय के परिवार की मुश्किलें फिर बढ़ जाती हैं। इसके बाद फिल्म एक बार फिर विजय और पुलिस के बीच दिमागी मुकाबले में बदल जाती है। हर नए मोड़ के साथ कहानी में एक और पेंच जुड़ता है। विजय हमेशा की तरह परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने की कोशिश करता है।

विजय का किरदार अब भी सबसे मजबूत

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत अजय देवगन हैं। विजय के चेहरे की शांति और आंखों में छिपा तनाव किरदार को असरदार बनाता है। वह कोई पारंपरिक हीरो नहीं है, फिर भी दर्शक उसकी मुश्किलों से जुड़ जाते हैं। यही ‘दृश्यम’ की खासियत रही है।

जयदीप अहलावत भी अपने किरदार में जमे हैं। उनका संयमित अंदाज विजय के लिए एक मजबूत चुनौती खड़ी करता है। प्रकाश राज के हिस्से में कुछ हल्के-फुल्के और मजेदार पल आते हैं, जबकि श्रिया सरन भावनात्मक दृश्यों में प्रभाव छोड़ती हैं।

क्लाइमैक्स से रह जाती है कमी

फिल्म में कई अच्छे ट्विस्ट हैं और कहानी ज्यादातर समय दर्शकों को बांधे रखती है, लेकिन समस्या क्लाइमैक्स में आती है। जिस आखिरी टकराव का इंतजार पूरी फिल्म के दौरान कराया जाता है, उसमें वह जोरदार असर नहीं दिखता जिसकी उम्मीद थी। कई संवाद जरूरत से ज्यादा लंबे लगते हैं और कुछ जगह कहानी अपनी बात को खींचती हुई महसूस होती है।

इसके बावजूद फिल्म पूरी तरह निराश नहीं करती। यह एक मनोरंजक थ्रिलर है, जिसमें पुराने किरदारों और घटनाओं का भावनात्मक असर बना रहता है। आखिर में सवाल यही रह जाता है कि विजय सालगांवकर की कहानी के लिए क्या इससे ज्यादा यादगार विदाई हो सकती थी। फिल्म अच्छी है, लेकिन शानदार अंत की उम्मीद लेकर पहुंचे दर्शकों को शायद थोड़ी कमी महसूस होगी।

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