पाकिस्तान की सैन्य क्षमता में चीन की बढ़ती भूमिका को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। पूर्व एयर मार्शल संजीव कपूर ने दावा किया है कि पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद चीन की मदद से छह सैटेलाइट लॉन्च किए हैं, जिनसे भारत की निगरानी क्षमता पर असर पड़ सकता है। उनके मुताबिक पाकिस्तान के सैन्य हार्डवेयर में भी चीन की हिस्सेदारी काफी बढ़ी है। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान को चीन से मिली आठ पनडुब्बियां हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री रणनीति को प्रभावित कर सकती हैं। इन दावों का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि आधुनिक युद्ध में केवल जमीन या आसमान की ताकत ही निर्णायक नहीं होती, बल्कि अंतरिक्ष आधारित निगरानी और समुद्र के भीतर मौजूद क्षमताएं भी सैन्य योजना का अहम हिस्सा बन चुकी हैं। ऐसे में पाकिस्तान की नई क्षमताओं को भारत की निगरानी और समुद्री सुरक्षा व्यवस्था के संदर्भ में देखा जा रहा है।
सैटेलाइट से निगरानी की बदलती तस्वीर
पूर्व एयर मार्शल संजीव कपूर के मुताबिक पाकिस्तान की निगरानी क्षमता में पिछले कुछ समय में बड़ा बदलाव आया है। उनका दावा है कि चीन की तकनीकी मदद से पाकिस्तान ने छह सैटेलाइट लॉन्च किए हैं, जो भारत से जुड़ी गतिविधियों पर नजर रखने की क्षमता रखते हैं। उनका कहना है कि पहले सैन्य अभियानों में किसी विशेष क्षेत्र के ऊपर सैटेलाइट के गुजरने का इंतजार करना पड़ सकता था, लेकिन ज्यादा सैटेलाइट होने से निगरानी का अंतराल कम किया जा सकता है।
हालांकि, छह सैटेलाइटों के भारत-विरोधी निगरानी मिशन के दावे को स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि पूर्व अधिकारी के आकलन के रूप में देखना जरूरी है। सैटेलाइट की वास्तविक भूमिका उसके सेंसर, कक्षा, रिजॉल्यूशन और इस्तेमाल की व्यवस्था पर निर्भर करती है।
चीन की पनडुब्बियों से समुद्री समीकरण
पाकिस्तान की नौसैनिक ताकत का दूसरा बड़ा पहलू चीन से मिलने वाली आठ पनडुब्बियां हैं। संजीव कपूर के अनुसार इनमें चार पनडुब्बियां चीन में और चार पाकिस्तान में तैयार की जानी हैं। इनका इस्तेमाल पाकिस्तान की समुद्री निगरानी और पानी के भीतर युद्धक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। इन पनडुब्बियों की खासियत एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी AIP तकनीक से जुड़ी है। ऐसी व्यवस्था पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को लंबे समय तक पानी के भीतर संचालन में मदद करती है, जिससे उनकी पहचान करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
अरब सागर से हिंद महासागर तक चुनौती
अगर पाकिस्तान की समुद्री निगरानी और पनडुब्बी क्षमता में अपेक्षित बढ़ोतरी होती है, तो भारत के लिए एंटी-सबमरीन वॉरफेयर और समुद्री निगरानी की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी। अरब सागर में पाकिस्तान की नौसैनिक गतिविधियों के साथ-साथ हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री यातायात और रणनीतिक मार्गों की निगरानी भी अहम होगी। भारत के पास P-8I समुद्री निगरानी विमान, MH-60R हेलिकॉप्टर और अन्य समुद्री निगरानी प्रणालियां हैं। इनके जरिए पानी के भीतर मौजूद संभावित खतरों का पता लगाने और उन पर नजर रखने की क्षमता विकसित की गई है।
असली सवाल सिर्फ छह सैटेलाइट या आठ पनडुब्बियों का नहीं
इस पूरे मामले को केवल संख्या के आधार पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। सैटेलाइट, ड्रोन, रडार, पनडुब्बियां, समुद्री विमान और कमांड नेटवर्क जब एक साथ काम करते हैं, तब किसी देश की वास्तविक निगरानी क्षमता बनती है। चीन-पाकिस्तान सैन्य सहयोग में यही नेटवर्किंग आने वाले समय में सबसे महत्वपूर्ण पहलू हो सकती है। भारत के लिए चुनौती केवल पाकिस्तान के पास मौजूद प्लेटफॉर्म की संख्या नहीं, बल्कि उसकी निगरानी, सूचना साझा करने और समुद्री अभियानों में इन क्षमताओं के एकीकरण की है। यही वजह है कि अरब सागर से लेकर हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी तक समुद्री सुरक्षा पर भारत की निगरानी व्यवस्था को लगातार मजबूत करना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना हुआ है।












