इजरायल में नेतन्याहू की सत्ता पर संकट के संकेत? गादी आइजेनकोट का बढ़ता प्रभाव, जानें पूरी कहानी

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नई दिल्ली: इजरायल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने अब उनके ही पूर्व सहयोगी और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट मजबूत चुनौती के तौर पर उभरे हैं। 27 अक्टूबर 2026 को होने वाले आम चुनाव से पहले आए सर्वे में उनकी पार्टी याशार लिकुड को कड़ी टक्कर दे रही है, कई सर्वे में तो वह आगे भी निकल गई है।

कौन हैं गादी आइजेनकोट?

गादी आइजेनकोट इजरायल के पूर्व सैन्य प्रमुख हैं। उन्होंने 41 साल तक सेना में सेवा दी और 2015 से 2019 तक IDF के चीफ ऑफ स्टाफ रहे। 2025 में उन्होंने ‘याशार’ नाम से अपनी पार्टी बनाई, हिब्रू में जिसका मतलब होता है सीधा या ईमानदार। सैन्य पृष्ठभूमि के कारण उनकी छवि एक सख्त और सीधे बोलने वाले नेता की है। वह लंबे समय से राजनीति में नहीं रहे, इसलिए उनकी सादगी लोगों को पसंद आ रही है। हालांकि उन्हें नेतन्याहू का उदारवादी विकल्प समझना गलत होगा। फिलिस्तीन, हमास और ईरान पर उनका रुख भी बेहद सख्त है। वह दो-राष्ट्र समाधान के विरोधी हैं और जॉर्डन नदी से भूमध्य सागर तक इजरायल की सुरक्षा नियंत्रण की वकालत करते हैं।

7 अक्टूबर हमले के बाद बढ़ा असंतोष

यह चुनाव 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद पहला आम चुनाव है, जिसमें 1200 लोग मारे गए थे। इस हमले ने नेतन्याहू सरकार की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। इसके बाद गाजा में चला लंबा युद्ध, बंधकों की रिहाई में देरी और भ्रष्टाचार के केसों ने नेतन्याहू के खिलाफ असंतोष बढ़ाया है। बता दें, आइजेनकोट खुद नेतन्याहू की युद्ध कैबिनेट में पर्यवेक्षक के तौर पर शामिल थे, लेकिन 8 महीने बाद उन्होंने रणनीतिक मतभेदों के चलते इस्तीफा दे दिया था। उनका आरोप है कि सरकार हमास की सैन्य शक्ति खत्म करने का अपना लक्ष्य ही हासिल नहीं कर पाई।

बेटे को खोने की निजी कहानी से मजबूत हुई छवि

उनकी निजी कहानी भी उन्हें मजबूत बनाती है। गाजा युद्ध में उनके 25 वर्षीय बेटे गैल और दो भतीजों की मौत हो गई थी। मोरक्को से आए यहूदी परिवार से ताल्लुक रखने वाले आइजेनकोट अगर जीते तो इजरायल के पहले मिजराही प्रधानमंत्री बन सकते हैं। हालांकि राह आसान नहीं है। इजरायल में सरकार बनाने के लिए 120 में से 61 सीटों की जरूरत होती है। आइजेनकोट ने अरब दलों से गठबंधन से इनकार किया है, ऐसे में बहुमत जुटाना उनके लिए बड़ी चुनौती होगी।

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