नई दिल्ली: पाकिस्तान और अफगानिस्तान तालिबान के बीच तनाव अब सीधे युद्ध से प्रॉक्सी वॉर की तरफ बढ़ रहा है। सीमा पर हुई सीधी लड़ाई में पाकिस्तानी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा है, सैकड़ों जवान मारे गए हैं। इसके बाद अब पाक आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर ने अफगानिस्तान के अंदर ही तालिबान के खिलाफ नया मोर्चा खोलने की रणनीति बनाई है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तानी सेना अफगानिस्तान की पुरानी सरकारी सेना के बिखरे हुए सैनिकों और स्थानीय कबायली लड़ाकों को इकट्ठा कर रही है, ताकि उन्हें तालिबान के खिलाफ हथियार उठाने के लिए तैयार किया जा सके। न्यूज 18 की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इसके लिए बलूचिस्तान के दालबंदिन में एक ट्रेनिंग कैंप भी चलाया जा रहा है। यहां ट्रेनिंग पूरी करने के बाद इन लड़ाकों को वापस अफगानिस्तान भेजा जाएगा। आने वाले दिनों में कुचलाक और क्वेटा में भी ऐसे कैंप शुरू होने की खबर है।
15-20 हजार में लड़ाकों की भर्ती
एक बलूच पत्रकार के हवाले से बताया गया है कि पाक सेना तालिबान के हमले के बाद तितर-बितर हुए अफगान सैनिकों को पैसे का लालच देकर भर्ती कर रही है। स्थानीय नेताओं के लड़ाकों को भी इसमें शामिल किया जा रहा है। खुद आर्थिक तंगी से जूझ रहा पाकिस्तान इन लड़ाकों को 15 से 20 हजार रुपये महीना तनख्वाह दे रहा है।
यह पाकिस्तान का पुराना तरीका रहा है। 80 के दशक में अमेरिका के पैसे पर उसने सोवियत संघ के खिलाफ तालिबान को ट्रेनिंग दी थी। बाद में अमेरिका के साथ मिलकर उसी तालिबान के खिलाफ लड़ाई में शामिल हो गया। इसी दोहरी नीति की वजह से अफगानिस्तान में कट्टरपंथी और उदारवादी, दोनों ही तबके पाकिस्तान से नफरत करते हैं।
एक-दूसरे पर अस्थिरता फैलाने का आरोप
रिश्तों में कड़वाहट की बड़ी वजह डूरंड लाइन भी है। तालिबान सरकार का आरोप है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान को अस्थिर करना चाहता है, वहीं इस्लामाबाद का कहना है कि काबुल तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को मदद देकर पाकिस्तान में हमले करा रहा है।
जब तालिबान पहली बार सत्ता में आया था तब इस्लामाबाद और काबुल के रिश्ते अच्छे थे, लेकिन अमेरिकी हमले के बाद पाकिस्तान के अमेरिका का साथ देने से सब बदल गया। अमेरिकी वापसी को इमरान खान ने गुलामी की जंजीर टूटना बताया था, लेकिन तालिबान ने दोस्ती का हाथ ठुकरा दिया। तब से सीमा पर रोजाना गोलीबारी और तनाव आम बात हो गई है।












