सौरभ राजपूत की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला की ओर से निचली अदालत के आदेश के खिलाफ अपील करने की जानकारी सामने आई है। दोनों की तरफ से अदालत में यह दलील रखने की तैयारी बताई जा रही है कि उनके विरुद्ध दिए गए फैसले और सजा पर दोबारा विचार किया जाए। मेरठ की जिला एवं सत्र अदालत ने सुनवाई पूरी होने के बाद दोनों को हत्या तथा साक्ष्य मिटाने से जुड़े आरोपों में दोषी माना था। इसके बाद अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मृत्युदंड सुनाया।
अब इस फैसले की वैधता और दोषसिद्धि को लेकर उच्च न्यायालय में कानूनी बहस होने की संभावना है। हालांकि, अपील दाखिल होने की स्थिति और उस पर सुनवाई की तारीख की पुष्टि अदालत की आधिकारिक जानकारी से ही होगी।
मृत्युदंड की पुष्टि के लिए भी जरूरी है उच्च न्यायालय की मंजूरी
इस मामले में अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता कृष्णकांत चौबे के अनुसार, निचली अदालत की ओर से सुनाई गई फांसी की सजा की पुष्टि के लिए प्रकरण हाईकोर्ट भेजा गया है। उनके मुताबिक, संबंधित अदालत से पुष्टि की प्रक्रिया पूरी होने की जानकारी अभी प्राप्त नहीं हुई थी।
कानूनी व्यवस्था के तहत मृत्युदंड के मामलों में हाईकोर्ट की पुष्टि आवश्यक होती है। दोषी पक्ष को भी फैसले के विरुद्ध अपील करने का अधिकार है। ऐसे में मामले की आगे की दिशा इस बात से तय होगी कि अपील किस समय दर्ज होती है और अदालत उसके आधारों पर क्या रुख अपनाती है।
प्लास्टिक के ड्रम में शव छिपाने से खुला था मामला
यह घटना मेरठ के ब्रह्मपुरी थाना क्षेत्र की है। पुलिस की जांच में सामने आया था कि सौरभ राजपूत की हत्या के बाद उसके शव को नीले रंग के प्लास्टिक ड्रम में रखा गया था। इसके बाद ड्रम को सीमेंट और कंक्रीट से बंद किए जाने की बात सामने आई।
घटना का खुलासा होने के बाद पुलिस ने मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को गिरफ्तार किया था। शव को छिपाने के तरीके के कारण इस मामले ने व्यापक चर्चा बटोरी थी। जांच के बाद प्रकरण अदालत तक पहुंचा और दोनों के खिलाफ मुकदमे की सुनवाई चली।
अक्टूबर में सुनाया गया था मृत्युदंड का फैसला
मेरठ की जिला एवं सत्र अदालत ने 30 सितंबर 2026 को दोनों को दोषी ठहराया था। इसके बाद 14 अक्टूबर को सजा सुनाते हुए अदालत ने इसे अत्यंत दुर्लभ श्रेणी का मामला माना। दोनों पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। साक्ष्य छिपाने से संबंधित आरोपों पर भी अदालत ने दंड निर्धारित किया था।
अब कानूनी दलीलों पर टिकी रहेंगी निगाहें
दोषी पक्ष की ओर से निचली अदालत के आदेश को अनुचित और कानून के विरुद्ध बताते हुए रद्द करने की मांग किए जाने की जानकारी है। वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील शुक्ला सहित अन्य वकीलों के उनके पक्ष में पैरवी करने की बात सामने आई है।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों, निचली अदालत की विवेचना और सजा के कानूनी आधारों की समीक्षा हो सकती है। अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।












