
नई दिल्ली: किसी घर का चिराग अचानक गायब हो जाए, मां की आंखें दरवाजे पर टिकी रह जाएं और पिता की हर सुबह अपने बच्चे की तलाश में गुजरने लगे, तो उस परिवार का दर्द शब्दों में बयां करना आसान नहीं होता। लेकिन ऐसे ही बेबस परिवारों की उम्मीद बनकर दिल्ली पुलिस के उत्तर-पश्चिम जिले की एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (एएचटीयू) के दो पुलिसकर्मियों ने उल्लेखनीय कामयाबी हासिल की है। महज सात महीनों के भीतर 205 लापता बच्चों को तलाशकर सकुशल बरामद किया गया और उन्हें उनके परिवारों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई गई।
इस अभियान में सहायक उपनिरीक्षक शंकर लाल रार और हेड कांस्टेबल रतन सिंह की जोड़ी ने अपनी मेहनत, सूझबूझ, संवेदनशीलता और लगातार प्रयासों से एक के बाद एक सफलता हासिल की। बरामद किए गए 205 बच्चों में 51 लड़के और 154 लड़कियां शामिल हैं। इन आंकड़ों के पीछे उन परिवारों की अनगिनत बेचैन रातें और बच्चों के सुरक्षित लौटने पर छलकती खुशी छिपी है।
कहीं घड़ी से मुकाबला, कहीं सालों पुराने रहस्य से पर्दा
इस टीम की कार्यशैली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पांच मामलों में लापता बच्चों को शिकायत या रिपोर्ट दर्ज होने के महज एक से दो घंटे के भीतर तलाश कर सकुशल बरामद कर लिया गया। सूचना मिलते ही पुलिसकर्मियों ने तेजी से कार्रवाई की और बच्चों को खोजने के लिए हरसंभव प्रयास किए। संवेदनशील मामलों में दिखाई गई यह तत्परता पुलिस टीम की सक्रियता और बेहतर समन्वय को दर्शाती है।
इतना ही नहीं टीम ने उन मामलों में भी उम्मीद की लौ बुझने नहीं दी, जिनमें बच्चे पांच से छह वर्षों से लापता थे। समय बीतने के साथ जिन परिवारों की उम्मीदें कमजोर पड़ने लगी थीं, उन मामलों को भी दोबारा गंभीरता से खंगाला गया। पुराने रिकॉर्ड, उपलब्ध सुराग, जांच और लगातार पीछा करने की रणनीति के जरिए बच्चों का पता लगाया गया और उन्हें सकुशल बरामद किया गया।
दो पुलिसकर्मी, एक मिशन और 205 परिवारों की खुशियां
सहायक उपनिरीक्षक शंकर लाल रार और हेड कांस्टेबल रतन सिंह ने इस पूरी मुहिम में निरंतर मेहनत और धैर्य का परिचय दिया। लापता बच्चों की तलाश को केवल विभागीय जिम्मेदारी नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना से जुड़ा मिशन बनाकर काम किया। उनकी कोशिशों ने कई परिवारों को वर्षों बाद अपने बच्चों को देखने और गले लगाने का सुख दिया। उत्तर-पश्चिम जिला पुलिस की यह उपलब्धि बताती है कि लापता बच्चों की तलाश में समय की हर घड़ी कितनी महत्वपूर्ण होती है। एक ओर जहां कुछ बच्चों को चंद घंटों में खोज निकाला गया, वहीं दूसरी ओर वर्षों पुराने मामलों को सुलझाकर परिवारों को नई जिंदगी जैसी खुशी दी गई।
पुलिस उपायुक्त आकांक्षा यादव के नेतृत्व में जिले की एएचटीयू की यह उपलब्धि बच्चों की सुरक्षा और संरक्षण के प्रति दिल्ली पुलिस की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है। दिल्ली पुलिस का स्पष्ट संदेश है कि प्रत्येक लापता बच्चा प्राथमिकता है और उसकी तलाश में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी।
आंकड़ों में उपलब्धि
– कुल बरामद बच्चे: 205
– लड़के: 51
– लड़कियां: 154
– सात महीने में हासिल की गई सफलता
– पांच मामलों में एक से दो घंटे के भीतर बरामदगी
– पांच से छह साल पुराने मामलों में भी सफलता
टीम के जांबाज:
सहायक उपनिरीक्षक शंकर लाल रार और हेड कांस्टेबल रतन सिंह।
डीसीपी का संदेश साफ है लापता मासूमों की तलाश में दिल्ली पुलिस की कोशिशें जारी रहेंगी, क्योंकि हर बच्चा किसी परिवार की दुनिया है और हर परिवार को अपने बच्चे के लौटने का इंतजार है।












