आम आदमी पर पड़ेगी ईरान युद्ध की मार, 20% तक बढ़ सकती है कैंसर और एंटीबायोटिक्स जैसी जरूरी दवाओं की कीमत

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ईरान युद्ध के कारण पश्चिम एशिया में सप्लाई चेन बाधित होने से फार्मा कंपनियों के उत्पादन खर्च बढ़ गए हैं. सरकार इन बढ़े हुए खर्चों को देखते हुए जरूरी दवाओं की कीमतों में 10 से 20 प्रतिशत तक की अस्थायी बढ़ोतरी की अनुमति देने पर गंभीरता से विचार कर रही है. यह राहत छोटी अवधि के लिए होगी, ताकि दवाओं की उपलब्धता बनी रहे.

सूत्रों के अनुसार यह प्रस्ताव कैंसर की दवाओं, एंटीबायोटिक्स, इंजेक्शन और अन्य नियंत्रित दवाओं पर लागू हो सकता है. न्यूनतम तीन महीने की समय सीमा पर चर्चा चल रही है. सरकार का मानना है कि राहत केवल सप्लाई व्यवधान की अवधि तक ही सीमित रहेगी. स्थिति सामान्य होते ही कीमतें पुराने स्तर पर वापस आ जाएंगी.

फार्मा उद्योग ने सरकार से इस संकट से निपटने के लिए मदद मांगी है. ऑर्गनाइजेशन ऑफ फार्मास्यूटिकल प्रोड्यूसर्स ऑफ इंडिया (OPPI) और इंडियन फार्मास्यूटिकल एलायंस (IPA) समेत कई संगठनों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है. उद्योग का कहना है कि इनपुट लागत में तेज उछाल के कारण मुनाफे की मार्जिन बहुत पतली हो गई है.

कुछ कंपनियों ने 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की मांग की, लेकिन सरकार 10-20 प्रतिशत से ज्यादा की तीव्र बढ़ोतरी को मंजूरी नहीं देना चाहती. राहत को संतुलित और सीमित रखने पर जोर है. समस्या मुख्य रूप से सॉल्वेंट्स की सप्लाई में आई बाधा से उत्पन्न हुई है. सॉल्वेंट्स पेट्रोकेमिकल उत्पाद हैं, जो दवा निर्माण में इस्तेमाल होते हैं. ये दवाओं को घोलने, प्रोसेस करने और शुद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

ईरान क्षेत्र में युद्ध के चलते इनकी आपूर्ति प्रभावित हुई, जिससे उत्पादन लागत बढ़ गई. हालांकि सॉल्वेंट्स अंतिम दवा में नहीं रहते, लेकिन बिना इनके ज्यादातर दवाओं का उत्पादन संभव नहीं है. उद्योग जगत का कहना है कि लागत में और इजाफा होने पर कुछ दवाओं का उत्पादन घाटे का हो सकता है.

कंपनियों के पास अतिरिक्त खर्च सहने की सीमित क्षमता है. अगर स्थिति नहीं सुधरी तो कुछ फॉर्मूलेशन बनाना मुश्किल हो जाएगा. सरकार इस बात को समझते हुए उद्योग को मदद पहुंचाने की इच्छुक है, लेकिन आम उपभोक्ताओं पर ज्यादा बोझ नहीं पड़ना चाहिए. यह कदम कोविड काल जैसी अस्थायी राहत की तरह है.

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