सऊदी पर हूती हमले से भड़का तेल बाजार, ब्रेंट क्रूड 106 डॉलर के पार, जानें भारत पर क्या होगा असर

0
5

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव की आंच अब दुनिया के तेल बाजार तक पहुंच गई है। सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हूती विद्रोहियों के हमलों की खबरें और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल की आवाजाही को लेकर बनी अनिश्चितता ने कारोबारियों को चौकन्ना कर दिया है। 14 अक्टूबर को इसका असर कीमतों में साफ दिखा। ब्रेंट क्रूड करीब 106.58 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड 94.94 डॉलर पर था।

यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब के तेल ठिकानों को निशाना बनाने की खबरें तेज हुई हैं। 13 अक्टूबर को सऊदी अरब के ढहरान में सरकारी कंपनी सऊदी अरामको की एक प्रशासनिक इमारत पर संदिग्ध हूती हमले की सूचना आई। इससे वहां सीमित आग लगने की बात कही गई। सऊदी अरब दुनिया के बड़े तेल उत्पादकों में गिना जाता है। इसलिए उसके ऊर्जा ढांचे पर खतरा बाजार के लिए बड़ी बात बन जाता है। आशंका यह है कि अगर संघर्ष बढ़ा, तो तेल का उत्पादन, भंडारण या निर्यात प्रभावित हो सकता है। यहां एक बात समझना जरूरी है। कीमतें बढ़ने के लिए तेल की असल सप्लाई घटना जरूरी नहीं है। अगर कारोबारियों को लगता है कि आगे चलकर उत्पादन या निर्यात में रुकावट आ सकती है, तो वे इस जोखिम को पहले ही कीमतों में जोड़ लेते हैं।

होर्मुज पर क्यों टिकी हैं सबकी नजरें

कच्चे तेल की कीमतें सिर्फ उत्पादन से तय नहीं होतीं। उसे एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना भी उतना ही अहम है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे अहम तेल रास्तों में से एक है। यहां जहाजों की आवाजाही में गड़बड़ी हुई, तो दुनियाभर में तेल की सप्लाई पर दबाव पड़ सकता है।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस महीने की शुरुआत में टैंकरों पर हमलों के बाद इस रास्ते से तेल की ढुलाई प्रभावित हुई थी। अगर समुद्री रास्तों पर खतरा बढ़ता है, तो तेल पहुंचने में देरी होगी और माल ढुलाई तथा बीमा का खर्च भी चढ़ेगा। इससे तेल खरीदने वाली कंपनियों की लागत बढ़ेगी और कीमतों पर और दबाव बनेगा।

क्या दूसरे देशों से मिलेगी राहत

आगे कीमतें किस तरफ जाएंगी, यह इस पर भी निर्भर करेगा कि बाकी उत्पादक देश कितना अतिरिक्त तेल बाजार में उतार पाते हैं। रूस से डीजल का निर्यात बढ़ने की संभावना से ईंधन बाजार को कुछ सहारा मिल सकता है। लेकिन इससे पश्चिम एशिया की चिंताओं की पूरी भरपाई हो पाएगी या नहीं, यह अभी साफ नहीं है। एक और पहलू है। अगर उत्पादन चालू रहे, लेकिन सुरक्षा खतरों की वजह से तेल रिफाइनरियों तक देर से पहुंचे, तब भी बाजार में सप्लाई कम पड़ सकती है। यही कारण है कि कारोबारी अब सिर्फ उत्पादन के आंकड़े नहीं देख रहे, बल्कि समुद्री रास्तों के हालात और निर्यात में संभावित रुकावटों पर भी नजर रखे हुए हैं।

भारत पर क्या पड़ेगा असर

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेश से कच्चा तेल खरीदकर पूरा करता है। ऐसे में अगर अंतरराष्ट्रीय कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं, तो देश का तेल आयात बिल बढ़ सकता है। हालांकि, कच्चा तेल महंगा होने का मतलब यह नहीं कि पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत बढ़ जाएंगे। घरेलू कीमतें सरकार की कर नीति, तेल कंपनियों के फैसलों और लागत में बदलाव जैसी कई बातों पर निर्भर करती हैं।

असर सिर्फ ईंधन तक सीमित नहीं रहता। जब परिवहन और माल ढुलाई महंगी होती है, तो फैक्ट्रियों में बनने वाले सामान और दूसरी आर्थिक गतिविधियों की लागत भी बढ़ती है। समय के साथ इसका असर वस्तुओं और सेवाओं के दामों पर दिख सकता है।

तेल की ऊंची कीमतें भारत के व्यापार संतुलन पर भी बोझ डाल सकती हैं। तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर चुकाने पड़ें, तो डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव आ सकता है। तेल मार्केटिंग कंपनियों की लागत और देश में महंगाई की चाल भी इससे प्रभावित हो सकती है। हालांकि असली असर इस पर टिका होगा कि कीमतें कितनी बढ़ती हैं और कितने समय तक ऊंची रहती हैं।

फिलहाल दुनिया के ऊर्जा बाजार की नजर चार बातों पर है: पश्चिम एशिया का संघर्ष, सऊदी अरब के ऊर्जा ढांचे की सुरक्षा, होर्मुज से टैंकरों की आवाजाही और दूसरे उत्पादकों से मिलने वाली अतिरिक्त सप्लाई। आने वाले दिनों में यही बातें तय करेंगी कि तेल की तेजी बनी रहेगी या बाजार को कुछ राहत मिलेगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here