नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय खेलों के मंच पर जब तिरंगा शान से लहराता है और पदकों की चमक से देश का सिर गर्व से ऊंचा होता है, तो उस सफलता के पीछे खिलाड़ियों के साथ उन प्रशिक्षकों का भी बड़ा योगदान होता है, जिनकी मेहनत अक्सर सुर्खियों से दूर रह जाती है। हाल ही में संपन्न पांचवें एशियाई पैरा खेलों में भारत ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए कुल 114 पदक अपने नाम किए और अपना पिछला रिकॉर्ड भी तोड़ दिया। इस शानदार उपलब्धि में पैरा-एथलेटिक्स ने अकेले 65 पदकों का योगदान दिया।
पीएम मोदी से मुलाकात में मिले उचित प्रतिनिधित्व
इसी सफलता के बीच अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रस्तावित मुलाकात में पैरा-एथलेटिक्स के प्रशिक्षकों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की मांग उठने लगी है। चर्चा है कि प्रधानमंत्री से मिलने वाले खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों की संख्या सीमित रखी जा सकती है। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस खेल ने देश को सबसे अधिक पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई, उसके प्रशिक्षकों को सम्मानजनक स्थान मिलेगा या नहीं?
65 पदकों के शिल्पकारों का बढ़ेगा मनोबल
दरअसल किसी खिलाड़ी की सफलता केवल उसकी प्रतिभा का परिणाम नहीं होती। उसके पीछे वर्षों का कठिन अभ्यास, अनुशासन, रणनीति, तकनीकी मार्गदर्शन और प्रशिक्षक का निरंतर सहयोग शामिल रहता है। कई बार प्रशिक्षक अपनी व्यक्तिगत सुविधाओं को पीछे छोड़कर खिलाड़ियों के सपनों को साकार करने में जुटे रहते हैं। मांग है कि 65 पदकों के योगदान को देखते हुए पैरा-एथलेटिक्स के प्रशिक्षकों को प्रधानमंत्री से मुलाकात में अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए। इससे उनका मनोबल बढ़ेगा और आगामी विश्व चैंपियनशिप तथा पैरालंपिक खेलों की तैयारियों को नई ऊर्जा मिलेगी।
Reported By: Pankaj Rai












