पंजाब सीएम के ओएसडी घुम्मन ने सीबीआई कार्रवाई के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया

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पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के ओएसडी राजबीर सिंह घुम्मन ने केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई की कार्रवाई के खिलाफ पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया है। घुम्मन ने अपने वकील के जरिए दायर याचिका में सीबीआई की ओर से दर्ज एफआईआर के साथ-साथ उनके पैतृक घर पर की गई तलाशी और जब्ती की कार्रवाई को भी चुनौती दी है। याचिका में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए को मुख्य कानूनी आधार बनाया गया है। घुम्मन का दावा है कि उनके खिलाफ जिस मामले में जांच शुरू की गई है, वह उनकी सरकारी भूमिका और कथित आधिकारिक फैसलों से संबंधित है।

ऐसे मामलों में जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से आवश्यक पूर्व अनुमति लिए जाने का प्रावधान होने की बात याचिका में कही गई है। उनका आरोप है कि सीबीआई ने पंजाब सरकार से ऐसी मंजूरी लिए बिना कार्रवाई आगे बढ़ाई। इसी आधार पर उन्होंने अदालत से जांच पर तत्काल अंतरिम रोक लगाने और आगे किसी भी दंडात्मक कदम से सुरक्षा देने की मांग की है।

धारा 17ए को लेकर उठाया कानूनी सवाल

घुम्मन की याचिका का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि सरकारी पद पर रहते हुए लिए गए आधिकारिक फैसलों से संबंधित कथित भ्रष्टाचार के मामलों में जांच या पूछताछ शुरू करने से पहले सक्षम सरकार की अनुमति आवश्यक होती है। उनका दावा है कि इस मामले में पंजाब सरकार से ऐसी पूर्व स्वीकृति नहीं ली गई।

याचिका में इसी प्रक्रिया को आधार बनाकर सीबीआई की जांच की वैधता पर सवाल उठाया गया है। हालांकि धारा 17ए का इस विशेष मामले में किस तरह इस्तेमाल होगा और क्या इसकी शर्तें पूरी होती हैं, इसका अंतिम फैसला अदालत की सुनवाई और दोनों पक्षों की दलीलों के बाद ही स्पष्ट होगा।

घर पर हुई तलाशी को भी दी चुनौती

राजबीर सिंह घुम्मन ने केवल एफआईआर या जांच प्रक्रिया पर आपत्ति नहीं जताई है। उन्होंने 6 अक्टूबर को संगरूर जिले के घराचों गांव स्थित अपने पैतृक निवास पर की गई तलाशी और जब्ती की कार्रवाई को भी हाईकोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में इस पूरी कार्रवाई को गैरकानूनी बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की गई है।

इसके अलावा चंडीगढ़ की विशेष अदालत की ओर से जारी किए गए सर्च वारंट की वैधता पर भी सवाल उठाया गया है। घुम्मन का पक्ष है कि यदि जांच शुरू करने की मूल प्रक्रिया ही आवश्यक कानूनी मंजूरी के बिना आगे बढ़ाई गई, तो उसके आधार पर की गई बाद की कार्रवाई की वैधता पर भी अदालत को विचार करना चाहिए।

गिरफ्तारी और सख्त कार्रवाई से राहत की मांग

याचिका में घुम्मन ने अपने खिलाफ किसी भी तरह की जबरदस्ती या दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग भी की है। उनका कहना है कि जब तक हाईकोर्ट इस मामले में फैसला नहीं करता, तब तक सीबीआई को गिरफ्तारी या किसी अन्य coercive step से रोका जाए।

याचिका के जरिए मोटे तौर पर तीन प्रमुख राहतें मांगी गई हैं। पहली, सीबीआई की जांच पर अंतरिम रोक; दूसरी, धारा 17ए के तहत जरूरी मंजूरी मिलने तक किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा; और तीसरी, पैतृक घर में हुई तलाशी, जब्ती और उससे जुड़े सर्च वारंट को चुनौती देते हुए उसे रद्द करने की मांग।

अदालत के फैसले से तय होगी आगे की दिशा

अब इस मामले में हाईकोर्ट की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। अदालत को यह देखना होगा कि घुम्मन के खिलाफ लगाए गए आरोप किस प्रकृति के हैं और क्या उन पर धारा 17ए की पूर्व अनुमति वाली व्यवस्था लागू होती है। साथ ही तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों पर भी न्यायिक परीक्षण होगा।

फिलहाल घुम्मन ने अदालत का दरवाजा खटखटाकर सीबीआई की कार्रवाई को कानूनी कसौटी पर परखने की मांग की है। दूसरी ओर जांच एजेंसी का पक्ष अदालत में सामने आने के बाद ही पूरे विवाद की तस्वीर और स्पष्ट होगी। इस मामले में आगे होने वाली सुनवाई से यह भी तय हो सकता है कि जांच फिलहाल जारी रहेगी या याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत मिलती है।

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