‘आतंकियों को बचाना बंद करो’, UNSC में भारत ने चीन-पाकिस्तान पर साधा निशाना

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नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर एक बार फिर चीन और पाकिस्तान की नीतियों पर सवाल उठाए हैं. भारत ने स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध व्यवस्था का इस्तेमाल राजनीतिक हित साधने के लिए नहीं होना चाहिए. इसके साथ सरकार ने आतंकियों की सूची में शामिल करने या नाम हटाने की प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने की जरूरत बताई है. 

भारत के प्रतिनिधि ने क्या कहा? 

सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली पर हुई चर्चा में संयुक्त राष्ट्र में भारत की प्रतिनिधि योजना पटेल ने कहा कि किसी भी देश को अपनी सदस्यता का इस्तेमाल आतंकवादियों को प्रतिबंध सूची से बाहर कराने या राजनीतिक कारणों से किसी संगठन को आतंकी घोषित कराने के लिए नहीं करना चाहिए उन्होंने जोर दिया कि संयुक्त राष्ट्र को संकीर्ण राजनीतिक हितों का मंच बनने से बचाना होगा. 

चीन-पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल

भारत का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब चीन पर पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई से जुड़े प्रस्तावों में अड़ंगा डालने के आरोप लगते रहे हैं. भारत लंबे समय से लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) से जुड़े आतंकियों को वैश्विक प्रतिबंध सूची में शामिल कराने की कोशिश करता रहा है. 

भारत के अनुसार, UNSC के स्थायी सदस्य के तौर पर चीन कई मौकों पर तकनीकी रोक के जरिए ऐसे प्रस्तावों को आगे बढ़ने से रोकता रहा है. नई दिल्ली का मानना है कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक व्यवस्था में किसी भी तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नुकसानदायक है. 

सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग

भारत ने चर्चा के दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार की आवश्यकता भी दोहराई. भारत ने कहा कि 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी व्यवस्था को आज की वैश्विक परिस्थितियों के हिसाब से बदलने की जरूरत है. भारत ने बताया कि पिछले 80 वर्षों में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की संख्या करीब चार गुना बढ़ चुकी है. इसके बावजूद सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना उस बदलती वैश्विक तस्वीर को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती. 

भारत ने स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में सुरक्षा परिषद का विस्तार करने की मांग की है. उसका कहना है कि ग्लोबल साउथ और विकासशील देशों को निर्णय लेने वाली इस शीर्ष संस्था में बेहतर और अधिक प्रभावी प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. 

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