नई दिल्ली: पंचांग के अनुसार देखा जाये तो इस बार शारदीय नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर को होगी और 20 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ नवरात्र का समापन होगा। इस दौरान देशभर में मां दुर्गा की पूजा, व्रत, पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाएगा। मां दुर्गा को समर्पित नौ दिनों के इस पर्व में भक्त अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं। घरों और मंदिरों में कलश स्थापना के साथ नवरात्र की शुरुआत होती है, जबकि इसके बाद अष्टमी, नवमी और दशहरा जैसे और भी महत्वपूर्ण पर्व आते हैं।
11 अक्टूबर से होगी नवरात्र की शुरुआत
शारदीय नवरात्र के पहले दिन आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि होगी। इसी दिन घरों और मंदिरों में विधि-विधान से कलश स्थापना की जाएगी। नवरात्र के प्रथम दिन मां दुर्गा के स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा करने की परंपरा है। कलश स्थापना के साथ भक्त नौ दिनों तक चलने वाली देवी आराधना का संकल्प लेते हैं। कई लोग पूरे नौ दिन तक व्रत रखते हैं, और श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार पूजा-पाठ और साधना करते हैं।
कलश स्थापना का शुभ समय क्या है?
11 अक्टूबर को कलश स्थापना के लिए अभिजीत मुहूर्त को शुभ माना गया है। उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार इस दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:36 बजे से दोपहर 12:24 बजे तक रहेगा। पूजा के मुहूर्त में शहर के अनुसार अंतर हो सकता है। सूर्योदय और स्थानीय समय में बदलाव के कारण अलग-अलग शहरों में समय कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है। इसलिए कलश स्थापना से पहले अपने शहर के पंचांग से समय की पुष्टि जरूर कर ले एक बार।
नवरात्र में क्यों किया जाता है दुर्गा सप्तशती का पाठ?
शारदीय नवरात्र को केवल व्रत और पूजा तक सीमित नहीं माना जाता है। धार्मिक परंपरा में इन दिनों को देवी साधना और आध्यात्मिक अनुशासन के लिए भी खास माना जाता है। और भक्त नवरात्र के दौरान दुर्गा सप्तशती, देवी कवच और सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करते हैं। मान्यता है कि मां दुर्गा की आराधना और मंत्र जाप से मन को शांति मिलती है और घर में सकारात्मक वातावरण बना रहता है। कुछ लोग पुरोहित से संकल्प लेकर दुर्गा सप्तशती का पाठ भी करवाते हैं।
अब हम जानेंगे नवरात्र के काश तारीखों के बारे में
बेलवरण पूजा
11 अक्टूबर को कलश स्थापना के बाद 16 अक्टूबर को होगी बेलवरण पूजा। नवरात्र के दौरान दुर्गा पूजा से जुड़ी कई विशेष परंपराएं भी निभाई जाती हैं। तो 16 अक्टूबर को बेलवरण पूजा होगी। बंगाल और पूर्वी भारत की दुर्गा पूजा परंपरा में बेलवरण का विशेष महत्व माना जाता है।
17 अक्टूबर को महा सप्तमी
17 अक्टूबर को महा सप्तमी की पूजा होगी। पंचांग के अनुसार सुबह 8:58 बजे के बाद सप्तमी से संबंधित पूजा की जाएगी। इस दिन नौपत्रिका प्रवेश, निशा पूजा और देवी स्थापना जैसी परंपराएं निभाई जाएंगी। दुर्गा पूजा पंडालों में मां दुर्गा के दर्शन के लिए पट भी इसी दिन खोले जाएंगे। इसके साथ ही दुर्गा पूजा का उत्सव अपने चरम की ओर आगे बढ़ने लगेगा।
18 अक्टूबर को दुर्गा अष्टमी
18 अक्टूबर को दुर्गा अष्टमी मनाई जाएगी। इस दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की पूजा की जाती है। अष्टमी के दिन व्रत, विशेष पूजा और कन्या पूजन का विशेष महत्व माना जाता है। कई स्थानों पर इसी दिन महानिशा पूजा भी की जाती है। भक्त मां दुर्गा से परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।
19 अक्टूबर को संधि पूजा और महानवमी
19 अक्टूबर को संधि पूजा और महानवमी का पर्व होगा। अष्टमी और नवमी तिथि के संधिकाल में संधि पूजा करने की परंपरा है। पंचांग के अनुसार इस बार संधि पूजा का विशेष समय सुबह 6:53 बजे बताया गया है। संधि काल को देवी आराधना के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान विशेष विधि-विधान से मां दुर्गा की पूजा की जाती है।
20 अक्टूबर को विजयादशमी और विसर्जन
20 अक्टूबर को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा। और इस दिन नवमी तिथि सुबह 9:35 बजे तक रहने के बाद नवरात्र व्रत का पारण किया जाएगा।इसी दिन मां दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन की परंपरा भी निभाई जाएगी। इसके साथ ही शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा के प्रमुख अनुष्ठानों का समापन होगा।
इस बार हाथी पर होगा मां दुर्गा का आगमन
धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस साल मां दुर्गा का आगमन हाथी पर माना जा रहा है। धार्मिक परंपराओं में हाथी को समृद्धि, स्थिरता और ऐश्वर्य का प्रतीक माना जाता है। मान्यता के अनुसार देवी का हाथी पर आगमन अच्छी वर्षा, कृषि में उन्नति और सुख-समृद्धि का संकेत माना जाता है। हालांकि, देवी की सवारी से जुड़े ये फलादेश धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक ज्योतिषीय गणनाओं पर आधारित हैं।
श्रद्धा और संयम के साथ करें देवी की पूजा
शारदीय नवरात्र मां दुर्गा की आराधना के साथ-साथ आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना का भी अवसर माना जाता है। इन नौ दिनों में देवी के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत, मंत्र जाप, पाठ और सेवा जैसे धार्मिक कार्य करते हैं।
अगर आप नवरात्र में पूजा कर रहे हैं तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार नियमों का पालन करें। और रोजाना देवी मंत्र का जाप, दुर्गा सप्तशती या देवी कवच का पाठ करे। जरूरतमंद लोगों की सहायता करे और सेवा भाव रखे। सबसे जरूरी बात यह है कि नवरात्र की पूजा दिखावे के बजाय श्रद्धा और सकारात्मक भावना के साथ की जाए। मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना हमें शक्ति, धैर्य, संयम और भक्ति का संदेश सिखाती है।












