बंगाली सिनेमा के जाने-माने नेशनल अवॉर्ड विजेता फिल्ममेकर राजा सेन का हुआ निधन

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नई दिल्ली: बंगाली सिनेमा के जाने-माने नाम और ‘दमु’ जैसी फिल्म के लिए नेशनल अवॉर्ड जीतने वाले निर्देशक राजा सेन अब नहीं रहे। रविवार, 16 अगस्त 2026 को कोलकाता के एक सरकारी अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद उन्होंने आखिरी सांस ली। वे 71 साल के थे। उनके जाने की खबर से फिल्म जगत और फैंस सदमे में हैं।  

SSKM अस्पताल में तोड़ा दम    

PTI के मुताबिक राजा सेन का इलाज कोलकाता के SSKM अस्पताल में चल रहा था। वे कई दिनों से वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे। अस्पताल के एक डॉक्टर ने बताया, “उन्हें कई स्वास्थ्य समस्याएं थीं। इलाज के बावजूद हालत गंभीर बनी रही।”  

बताया जा रहा है कि शुरुआत में पीठ के निचले हिस्से में चोट के कारण उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वहां इलाज के दौरान फेफड़े और दिल से जुड़ी दिक्कतें हो गईं।

बाद में उन्हें SSKM ले जाया गया, जहां किडनी की समस्या भी सामने आई। परिवार में पत्नी पापिया सेन और दो बेटियां सुभाश्री और श्रेयोशी हैं। सोशल मीडिया पर बंगाली फिल्म इंडस्ट्री के लोग और फैंस लगातार उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं।  

दमु से मिली पहचान    

राजा सेन ने 1996 में फिल्म ‘दमु’ से फीचर फिल्म डेब्यू किया था। यह बच्चों पर बनी फिल्म थी और इसने ‘बेस्ट चिल्ड्रन्स फिल्म’ का नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीता। इसी फिल्म ने उन्हें बंगाली सिनेमा में एक गंभीर और संवेदनशील निर्देशक के तौर पर स्थापित कर दिया। फिल्मों में आने से पहले उन्होंने टेलीविजन से करियर शुरू किया था। छोटे पर्दे पर काम करने के बाद वे सिनेमा में आए और अपनी अलग पहचान बनाई।  

तीन बार जीता नेशनल अवॉर्ड    

अपने करियर में राजा सेन ने तीन नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीते। ‘दमु’ के अलावा उन्होंने ‘देबीपक्ष’, ‘देश’ और ‘भालोबासर गल्पो’ जैसी फिल्में बनाईं, जिन्हें समीक्षकों और दर्शकों दोनों ने सराहा।  

उनकी आखिरी पूरी हुई फिल्म ‘भालोबासर गल्पो’ 2019 में रिलीज हुई थी। इससे पहले 2016 में ‘माया मृदंग’ आई थी। उनकी फिल्मों में रिश्तों, समाज और मानवीय संवेदनाओं की गहरी परतें देखने को मिलती थीं।  

एक युग का अंत    

राजा सेन का नाम सिर्फ बंगाली फिल्मों तक सीमित नहीं था। उन्होंने टेलीविजन और डॉक्यूमेंट्री में भी काम किया। उनकी कहानी कहने का अंदाज सरल था, लेकिन असर गहरा छोड़ता था।  

71 साल की उम्र में उनके निधन के साथ बंगाली सिनेमा ने एक ऐसा निर्देशक खो दिया जो पुरस्कारों से ज्यादा, सच्ची कहानियों के लिए जाना जाता था। फिल्म जगत के लिए यह एक बड़ी क्षति है।  

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