
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों के बाद ईरान और उसके आसपास के देशों की सुरक्षा को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि वाशिंगटन और तेल अवीव आने वाले समय में तेहरान के खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ा सकते हैं। हालांकि, संभावित हमले की तारीख को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। कुछ रिपोर्टों में इजराइल के चुनाव से पहले कार्रवाई की आशंका जताई गई है, जबकि अन्य में अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के बाद हालात बिगड़ने की संभावना व्यक्त की गई है।
फिलहाल किसी नए हमले की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इस बीच, खाड़ी देशों को डर है कि यदि संघर्ष दोबारा शुरू हुआ तो उसका असर सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि तेल आपूर्ति, डिजिटल संचार व्यवस्था, व्यापार और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
ट्रंप के बयान से सैन्य कार्रवाई की अटकलें तेज
रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने ईरान के साथ टकराव को और आगे बढ़ाने की संभावना से इनकार नहीं किया है। उनके रुख को देखते हुए यह सवाल उठ रहा है कि अमेरिका आगे आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ाएगा या फिर सैन्य कार्रवाई का रास्ता चुनेगा।
हालांकि, अभी तक किसी नए हमले के लिए निश्चित तारीख या अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसलिए संभावित कार्रवाई को लेकर चल रही चर्चाओं को पक्की जानकारी मानना उचित नहीं होगा। आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रशासन की घोषणाएं इस मामले में अहम हो सकती हैं।
ईरान की ताकत और खाड़ी देशों की बढ़ती चिंता
कुछ विश्लेषणों में आशंका जताई जा रही है कि नए संघर्ष की स्थिति में ईरान पश्चिम एशिया में अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर सकता है। ईरानी नेतृत्व के लिए भी यह दौर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में किस तरह का बदलाव आएगा, इसका अनुमान अभी लगाना मुश्किल है।
खाड़ी देशों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि युद्ध फैलने पर उनके तेल प्रतिष्ठानों, बंदरगाहों और अन्य महत्वपूर्ण सुविधाओं को निशाना बनाया जा सकता है। ऐसे किसी हमले से ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने के साथ-साथ कारोबार और बुनियादी ढांचे को दोबारा सामान्य बनाने में लंबा समय लग सकता है।
सैन्य ठिकानों के साथ ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर भी खतरा
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पिछले टकरावों के दौरान अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया था। इसके बाद अमेरिका अपनी सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव कर रहा है। हालांकि, सैन्य ठिकानों को खाली कराने या आगामी हमलों की तैयारी से जुड़े प्रत्येक दावे की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
इस बीच, तेल रिफाइनरियों, पाइपलाइनों, तेल क्षेत्रों और अन्य ऊर्जा सुविधाओं की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि इन प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका है।
डेटा सेंटर और समुद्र के नीचे बिछी केबलों पर भी नजर
कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि संभावित संघर्ष के अगले चरण में समुद्र के नीचे बिछी संचार केबलें, डेटा सेंटर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी सुविधाएं भी जोखिम में आ सकती हैं। ये व्यवस्थाएं इंटरनेट सेवाओं, बैंकिंग, डिजिटल कारोबार और अंतरराष्ट्रीय संचार के लिए महत्वपूर्ण हैं।
ईरान के पूर्व अधिकारी मोहसिन रजाई से जुड़े एक बयान में भी संभावित संघर्ष को अस्तित्व के लिए खतरा बताते हुए जवाबी कार्रवाई की चेतावनी देने का जिक्र किया गया है। हालांकि, इन सुविधाओं को संभावित निशाना बताए जाने भर से यह साबित नहीं होता कि उन पर हमला करने की कोई आधिकारिक योजना तैयार है।
ईरान की ड्रोन तैयारियों को लेकर भी चर्चा
रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC ने भूमिगत ड्रोन सुविधाओं से जुड़ी तस्वीरें या वीडियो जारी किए हैं। इसे अपनी सैन्य तैयारियों और उत्पादन क्षमता का प्रदर्शन करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
आधुनिक युद्ध में ड्रोन की भूमिका लगातार बढ़ी है। इनका इस्तेमाल निगरानी से लेकर हमले तक के लिए किया जाता है। हालांकि, ईरान की वास्तविक उत्पादन क्षमता और उसके सैन्य संसाधनों की स्थिति का आकलन करने के लिए स्वतंत्र तकनीकी जानकारी जरूरी है।
खाड़ी देशों की बैठक में गैर-आक्रामकता समझौते पर चर्चा
इस्तांबुल में तुर्किये, मिस्र, पाकिस्तान और सऊदी अरब के विदेश मंत्रियों की बैठक का भी रिपोर्ट में उल्लेख है। इसमें ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के प्रतिनिधियों की भागीदारी की बात कही गई है। बैठक का उद्देश्य सैन्य टकराव रोकने और बातचीत के जरिए समाधान तलाशने पर केंद्रित बताया गया है।
इसी संदर्भ में गैर-आक्रामकता समझौते यानी Non-Aggression Pact का प्रस्ताव भी चर्चा में आया है। इसके तहत संबंधित देश एक-दूसरे के क्षेत्र में मिसाइल, ड्रोन या हवाई हमले नहीं करने की प्रतिबद्धता दे सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, कतर ने खाड़ी सहयोग परिषद की बैठक में इस तरह का विचार रखा था।
अमेरिका पर भरोसे का सवाल और क्षेत्रीय समझौते की संभावना
कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि सऊदी अरब सहित खाड़ी के कई देश अपनी सुरक्षा के लिए क्षेत्रीय और यूरोपीय सहयोगियों के साथ विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत और ओमान को भी ऐसे प्रस्तावों के संभावित समर्थकों में गिना गया है।
इजराइली अखबार हारेत्ज से जुड़ी रिपोर्ट में भी अनुमान जताया गया है कि यदि अमेरिका पर भरोसा कम होता है, तो कुछ अरब देश ईरान के साथ सुरक्षा समझौते की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। हालांकि, अभी किसी अंतिम समझौते की पुष्टि नहीं हुई है।
कुल मिलाकर, पश्चिम एशिया में आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित देश सैन्य दबाव बढ़ाते हैं या बातचीत का रास्ता अपनाते हैं। यदि कूटनीतिक प्रयास सफल होते हैं, तो तनाव कम करने का अवसर मिल सकता है। इसके उलट, नया युद्ध पूरे खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।












