भारत-चीन पर प्रतिबंध लगाना चाहता था अमेरिका, यूरोपीय देशों ने ठुकराई मांग; ट्रंप के मंत्री का खुलासा

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नई दिल्ली: रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच मतभेद एक बार फिर सामने आए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन चाहता था कि यूरोपीय देश भारत और चीन पर रूसी तेल खरीदने के लिए प्रतिबंध लगाएं। हालांकि, यूरोपीय सहयोगियों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। अब अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के बयान से इस पूरे मामले का खुलासा हुआ है। उनके बयान के बाद रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर अमेरिका की रणनीति चर्चा में आ गई है।

यूरोपीय देशों ने क्यों ठुकराया अमेरिका का प्रस्ताव?

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने एनबीसी के कार्यक्रम ‘मीट द प्रेस’ में बातचीत के दौरान बताया कि अमेरिका ने अपने यूरोपीय साझेदारों से भारत और चीन पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। इसका मकसद रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बढ़ाना था, ताकि रूसी सरकार की कमाई पर असर पड़े। हालांकि, यूरोपीय देशों ने इस प्रस्ताव पर सहमति नहीं जताई। बेसेंट ने सवाल उठाया कि जब यूरोपीय देश खुद रूसी ऊर्जा का आयात कर रहे हैं, तो प्रतिबंधों का पूरा बोझ अमेरिका ही क्यों उठाए? उन्होंने यूरोप पर रूस से ऊर्जा खरीदकर यूक्रेन के खिलाफ जारी युद्ध को आर्थिक मदद देने का आरोप भी लगाया।

रूस से ऊर्जा खरीद पर यूरोप को घेरा

बेसेंट के मुताबिक, अमेरिका रूस से लगभग 4 अरब डॉलर के उत्पाद आयात करता है, जिसमें करीब 1.8 अरब डॉलर का उर्वरक शामिल है। वहीं, उनके दावे के अनुसार, यूरोपीय देशों का रूसी उत्पादों का आयात इससे लगभग दस गुना अधिक है। उन्होंने यूरोपीय देशों की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने के कारण उसकी युद्ध क्षमता को आर्थिक समर्थन मिलता है।

60 दिनों के लिए मिली अस्थायी छूट

इस बीच, अमेरिकी प्रशासन ने रूस पर प्रतिबंधों और भारत समेत अन्य देशों पर टैरिफ से जुड़ी छूट को 60 दिनों की अस्थायी अवधि से जोड़ा है। विदेश मंत्री मार्को रुबियो के अनुसार, इस दौरान यह आकलन किया जाएगा कि प्रतिबंधों और टैरिफ का वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है।

ट्रंप ने अपने फैसले को अमेरिका और दुनिया के लिए अच्छा बताया है। हालांकि, अमेरिकी सांसदों ने भी इस कदम पर सवाल उठाए हैं। भारतीय-अमेरिकी सांसद अमी बेरा ने इसे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को राहत देने वाला फैसला बताया। अब देखना होगा कि 60 दिनों की समीक्षा के बाद अमेरिकी प्रशासन रूस, भारत और चीन को लेकर अपनी नीति में क्या बदलाव करता है।

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