अहमदाबाद में साड़ी पहनकर गरबा करते हैं पुरुष, 200 साल पुरानी साडू माता की परंपरा है खास

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नई दिल्ली: नवरात्रि में जहां हर तरफ महिलाएं चनिया-चोली पहनकर गरबा करती दिखती हैं, वहीं अहमदाबाद की एक संकरी गली में रविवार को नजारा बिल्कुल अलग था। शाहपुर इलाके में बरोट समुदाय के पुरुषों ने रंग-बिरंगी साड़ियां पहनकर गरबा किया। स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह रस्म करीब 200 साल पुरानी एक कहानी से जुड़ी है, जिसमें बलिदान, पछतावा और प्रायश्चित की बात है।

साडू माता के सम्मान में गरबा

हर साल नवरात्रि की आठवीं रात को समुदाय के कम से कम 40 पुरुष और दूसरे श्रद्धालु साडू माता नी पोल में इकट्ठा होते हैं। वे साड़ी पहनते हैं, माथे पर लाल सिंदूर की बिंदी लगाते हैं और अपने समुदाय की महिला साडू माता के सम्मान में गरबा करते हैं। रविवार रात करीब 9 बजे साडू माता को समर्पित एक छोटे मंदिर के तंग आंगन में यह आयोजन हुआ।

पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, इस साल दूसरे समुदायों के 25 से 30 पुरुष भी इसमें शामिल हुए, जिनमें मुस्लिम समुदाय के लोग भी थे। 60 वर्षीय सतीश बरोट ने कहा कि यह उनके लिए गर्व की बात है, और वे 40 साल से ज्यादा समय से इसमें हिस्सा ले रहे हैं। सुरेंद्रनगर के पिंटू बरोट अपने परिवार के साथ अहमदाबाद आए थे। उन्होंने बताया कि उनका 10 साल का बेटा, भाई और भाई का बेटा पहली बार इस गरबा में शामिल हुए। साड़ी पहनते समय उनकी पत्नी उनकी मदद कर रही थीं।

200 साल पहले क्या हुआ था

पोल में रहने वाले तुषार बरोट के मुताबिक, उस दौर में बरोट समुदाय की साडू माता अपनी असाधारण सुंदरता के लिए जानी जाती थीं। इसी वजह से उन्हें अहमदाबाद के शाही दरबार में बुलाया गया। तत्कालीन शासक ने आदेश दिया कि उन्हें उनके सामने पेश किया जाए और इसके लिए सैनिकों का दल भी भेजा। तुषार ने बताया कि समुदाय के लोगों ने साडू माता की इच्छा के खिलाफ उन्हें दरबार भेजने का विरोध किया, जिससे उनके और सैनिकों के बीच लड़ाई हो गई। जब खतरा बढ़ा, तो साडू माता ने पहले अपनी बेटी अजूबा की हत्या कर दी। फिर उन्होंने पति हथीसिंह बरोट से कहा कि वे उन्हें तलवार के एक ही वार में मार दें, क्योंकि वे जबरन दरबार नहीं जाना चाहती थीं।

श्राप का डर और प्रायश्चित

साडू माता की मौत के बाद समुदाय के मन में गहरा पछतावा था कि वे उनकी रक्षा नहीं कर पाए। आगे चलकर लोगों को लगने लगा कि उन पर श्राप लग गया है। कई घरों में पुरुषों की मौत हुई और परिवारों की अगली पीढ़ियां घटती गईं। तुषार के अनुसार, माफी मांगने के लिए लोग उस जगह इकट्ठा हुए, जहां उनके सम्मान में मंदिर बना था। उन्होंने अपना दुख जताया और परिवारों के बचने व आगे बढ़ने की प्रार्थना की। मन्नत के तहत पुरुषों ने साडू बा से जुड़े कपड़े पहनने का वादा किया।

समुदाय का विश्वास है कि प्रार्थना के बाद परिवारों में फिर तरक्की होने लगी। इससे रस्म में उनकी आस्था और मजबूत हुई। धीरे-धीरे नवरात्रि की आठवीं रात पुरुषों के साड़ी पहनकर गरबा करने की परंपरा बन गई। स्थानीय निवासी कीर्तिभाई बरोट कहते हैं कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और वे समुदाय की खुशहाली की प्रार्थना करने के साथ साडू माता का आभार भी जताते हैं। तुषार के मुताबिक, हर उम्र के पुरुष इसमें हिस्सा लेते हैं और यह उनके लिए आस्था, भक्ति और समुदाय के वादों को निभाने का तरीका है।

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