नई दिल्ली: दिल्ली में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात की तस्वीरें खूब चर्चा में रहीं. हालांकि, इन तस्वीरों में दोनों नेताओं के अलावा दो ऐसे चेहरे भी नजर आए, जो लगातार उनके साथ चलते दिखे. ये दोनों कोई सामान्य अधिकारी नहीं, बल्कि भारत और चीन के बेहद भरोसेमंद दुभाषिए हैं. बड़े नेताओं के बीच होने वाली बातचीत में इनकी भूमिका बेहद अहम होती है, क्योंकि एक गलत शब्द भी कूटनीतिक बातचीत का अर्थ बदल सकता है.
प्रधानमंत्री मोदी के साथ नजर आने वाले अधिकारी का नाम सिद्धार्थ बाबू है, जबकि शी जिनपिंग के साथ लंबे समय से दिखाई देने वाले चीनी अधिकारी सन निंग हैं. दोनों अपने-अपने देश की विदेश सेवा से जुड़े हैं और कई अहम अंतरराष्ट्रीय बैठकों में नेताओं के लिए दुभाषिए की जिम्मेदारी निभा चुके हैं.
शी जिनपिंग के दुभाषिए सन निंग
शी जिनपिंग के साथ नजर आने वाले सन निंग को चीन के बेहतरीन अंग्रेजी दुभाषियों में गिना जाता है. उनका जन्म 1980 के दशक की शुरुआत में नानजिंग में हुआ था. भाषा पर उनकी मजबूत पकड़ और सामान्य ज्ञान को देखते हुए चीनी विदेश मंत्रालय ने विश्वविद्यालय की पढ़ाई पूरी होने से पहले ही उनमें रुचि दिखाई थी.
सन निंग ने नानजिंग फॉरेन लैंग्वेज स्कूल से पढ़ाई की और बाद में बीजिंग फॉरेन स्टडीज यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की शिक्षा ली. उन्होंने ब्रिटेन में भी आगे की पढ़ाई की. अगस्त 2003 में वह चीन के विदेश मंत्रालय के अनुवाद विभाग से जुड़े. चीनी विदेश मंत्रालय में दुभाषिए के तौर पर चयन आसान नहीं होता. इसके लिए कई स्तरों पर परीक्षा और मूल्यांकन से गुजरना पड़ता है. सन निंग की अंग्रेजी और चीनी भाषा पर मजबूत पकड़ के अलावा उनका शांत स्वभाव भी उनकी खासियत माना जाता है.
उन्होंने चीन के पूर्व प्रधानमंत्री ली केकियांग की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी अनुवाद किया और इस भूमिका से पहचान बनाई. शी जिनपिंग के नेतृत्व में आने के बाद उनकी विदेश यात्राओं की तस्वीरों और वीडियो में सन निंग लगातार नजर आने लगे. फरवरी 2012 में तत्कालीन उपराष्ट्रपति शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के दौरान भी वह उनके दुभाषिए के रूप में साथ गए थे.
पीएम मोदी के साथ सिद्धार्थ बाबू
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नजर आने वाले सिद्धार्थ बाबू भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी हैं. केरल के कोच्चि से आने वाले सिद्धार्थ 2017 बैच के अधिकारी हैं और विदेश मंत्रालय में काम करते हैं. उन्हें खास तौर पर मंदारिन और अंग्रेजी भाषाओं की अच्छी समझ है. पिछले कुछ वर्षों में वह प्रधानमंत्री मोदी के साथ कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में दुभाषिए की भूमिका निभाते दिखाई दिए हैं. जनवरी 2026 में गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम के दौरान यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन के साथ प्रधानमंत्री की बातचीत में भी उन्होंने यही जिम्मेदारी निभाई थी.
सिद्धार्थ बाबू ने अमेरिका के मिडिलबरी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज से भाषा की पढ़ाई की है. यहां भाषा के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंधों और कूटनीति की समझ पर भी जोर दिया जाता है. एक लेख में उन्होंने बताया था कि दुभाषिए अलग-अलग संस्कृतियों के बीच पुल का काम करते हैं. उनके मुताबिक, भाषा के छोटे-छोटे अंतर को समझना जरूरी है, क्योंकि कई बार शब्दों के पीछे छिपा अर्थ बातचीत का रुख बदल सकता है.
कूटनीति में क्यों अहम हैं दुभाषिए?
भारत और चीन जैसे देशों के शीर्ष नेताओं के बीच बातचीत बेहद संवेदनशील होती है. ऐसे में दुभाषिए केवल एक भाषा को दूसरी भाषा में बदलने का काम नहीं करते. उन्हें बातचीत का सही भाव, संदर्भ और सामने वाले की बात का असली मतलब भी समझना होता है. एक छोटी सी गलती या गलत भावार्थ से गलतफहमी पैदा हो सकती है. यही वजह है कि राष्ट्राध्यक्षों के साथ हमेशा अनुभवी और भरोसेमंद दुभाषिए मौजूद रहते हैं. सन निंग और सिद्धार्थ बाबू भी पर्दे के पीछे रहकर भारत-चीन समेत अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में संवाद को आसान बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं.












