स्ट्रोक दिवस विशेष: हर मिनट कीमती, हर लम्हा जिंदगी

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नई दिल्ली: जिंदगी कभी-कभी ऐसा इम्तिहान लेती है जिसमें कुछ मिनटों की देरी भी भारी पड़ सकती है। हंसता-खेलता इंसान अचानक बोलने की ताकत खो दे, चेहरे का एक हिस्सा टेढ़ा हो जाए या हाथ-पैर जवाब देने लगें तो इसे सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज करना जानलेवा साबित हो सकता है। ये लक्षण मस्तिष्कघात यानी स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में घबराने के बजाय तुरंत पहचान और सही अस्पताल तक पहुंचने की जरूरत है, क्योंकि स्ट्रोक के मामले में समय ही सबसे बड़ा हथियार है।

स्ट्रोक एक गंभीर चिकित्सकीय आपातस्थिति है, जिसमें मस्तिष्क के किसी हिस्से तक रक्त और ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित हो जाती है अथवा मस्तिष्क की रक्तवाहिका फटने से रक्तस्राव होने लगता है। समय पर उपचार नहीं मिलने पर मस्तिष्क की कोशिकाओं को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है। इसका असर मरीज की बोलने, चलने, देखने, समझने और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता पर पड़ सकता है। कई मामलों में समय रहते इलाज मिलने से जान बचाने के साथ दिव्यांगता की गंभीरता भी कम की जा सकती है।

दो तरह का स्ट्रोक, लेकिन खतरा दोनों में गंभीर

चिकित्सकीय दृष्टि से स्ट्रोक मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है। पहले प्रकार को इस्कीमिक स्ट्रोक कहते हैं, जिसमें रक्त का थक्का मस्तिष्क की रक्तवाहिका में रुकावट पैदा कर देता है। दूसरे प्रकार को रक्तस्रावी स्ट्रोक कहा जाता है जिसमें रक्तवाहिका फटने से मस्तिष्क के भीतर या उसके आसपास खून बहने लगता है। दोनों स्थितियों में तत्काल चिकित्सकीय जांच और अलग-अलग उपचार की आवश्यकता होती है। उच्च रक्तचाप स्ट्रोक के प्रमुख कारणों में शामिल है। इसके अलावा मधुमेह, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, हृदय की कुछ बीमारियां, विशेषकर अनियमित धड़कन की समस्या, धूम्रपान, अत्यधिक शराब का सेवन, मोटापा, शारीरिक गतिविधियों की कमी और असंतुलित खानपान भी खतरा बढ़ाते हैं। बढ़ती उम्र के साथ जोखिम अधिक हो सकता है, लेकिन यह बीमारी केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है। युवाओं में भी स्ट्रोक के मामले सामने आ सकते हैं। इसलिए उम्र चाहे जो हो, स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी संकेतों को गंभीरता से लेना जरूरी है।

चेहरे का टेढ़ापन और लड़खड़ाती जुबान खतरे की घंटी

स्ट्रोक की पहचान के लिए आम नागरिकों को कुछ आसान संकेत याद रखने चाहिए। यदि अचानक मुस्कुराने पर चेहरे का एक हिस्सा नीचे की ओर झुक जाए, एक हाथ या पैर में कमजोरी अथवा सुन्नपन महसूस हो या बोलने और दूसरों की बात समझने में परेशानी होने लगे, तो इसे खतरे की घंटी मानें। अचानक दिखाई देना कम होना, दोहरा दिखना, संतुलन बिगड़ना, चलने में परेशानी और बिना स्पष्ट कारण के बेहद तेज सिरदर्द भी स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं। ऐसे लक्षण सामने आने पर एक पल भी बर्बाद नहीं करना चाहिए।

याद रखें लक्षण शुरू होने का समय नोट करें, तुरंत एम्बुलेंस बुलाएं और मरीज को स्ट्रोक के उपचार की सुविधा वाले अस्पताल पहुंचाएं। लक्षण कुछ मिनटों में अपने आप ठीक हो जाएं, तब भी राहत की सांस लेकर लापरवाही न करें। यह क्षणिक मस्तिष्कीय रक्त प्रवाह की कमी का संकेत हो सकता है, जिसे भविष्य में बड़े स्ट्रोक की चेतावनी माना जाता है। मरीज को अपनी तरफ से एस्पिरिन या दूसरी दवा न दें, क्योंकि रक्तस्राव वाले स्ट्रोक में कुछ दवाएं नुकसान पहुंचा सकती हैं। मरीज को स्वयं वाहन चलाकर अस्पताल भी नहीं जाना चाहिए।

इलाज में हर मिनट की अहमियत, आधुनिक तकनीक से बढ़ी उम्मीद

स्ट्रोक का उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि मस्तिष्क की रक्तवाहिका में रुकावट आई है या रक्तस्राव हुआ है। अस्पताल पहुंचने पर चिकित्सक मस्तिष्क की संगणकीय टोमोग्राफी (सीटी) अथवा चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग (एमआरआई) और जरूरत के अनुसार रक्तवाहिकाओं की जांच कराते हैं। इन जांचों से स्ट्रोक का प्रकार समझने और उपचार का सही रास्ता चुनने में मदद मिलती है। रक्त का थक्का बनने से हुए स्ट्रोक में चुनिंदा मरीजों को चिकित्सकीय मानदंडों के अनुसार थक्का घोलने वाली दवा दी जा सकती है। सामान्यतः यह उपचार लक्षण शुरू होने के साढ़े चार घंटे के भीतर दिया जाता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में उन्नत जांच के आधार पर अधिक समय बीतने के बाद भी उपचार पर विचार किया जा सकता है।

बड़ी मस्तिष्कीय रक्तवाहिका में थक्का फंसने पर यांत्रिक थ्रोम्बेक्टॉमी नामक आधुनिक प्रक्रिया से रक्तवाहिका के रास्ते एक पतली नली पहुंचाकर थक्का निकाला जा सकता है। उपयुक्त मरीजों में, जांच के निष्कर्षों के आधार पर, यह प्रक्रिया लक्षण शुरू होने के 24 घंटे तक लाभ पहुंचा सकती है। हालांकि, हर मरीज इस उपचार के लिए उपयुक्त नहीं होता। यदि स्ट्रोक मस्तिष्क में रक्तस्राव के कारण हुआ है, तो रक्तचाप नियंत्रित करने, रक्तस्राव के कारण का उपचार करने और जरूरत पड़ने पर शल्य चिकित्सा की आवश्यकता हो सकती है। इसलिए बिना जांच के दवा लेना या घरेलू उपचार में समय गंवाना खतरनाक हो सकता है।

नई तकनीक से उम्मीद, पुनर्वास से जिंदगी में वापसी

आधुनिक चिकित्सा तकनीकों ने स्ट्रोक के उपचार में नई संभावनाएं पैदा की हैं। उन्नत मस्तिष्क इमेजिंग, रक्तवाहिकाओं के भीतर से उपचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पहचान प्रणालियां और दूरस्थ विशेषज्ञ परामर्श जैसी सुविधाएं उपचार संबंधी निर्णयों को तेज करने में सहायक हो सकती हैं। यांत्रिक थ्रोम्बेक्टॉमी के अलावा, कुछ मरीजों में मस्तिष्क की सूजन और दबाव कम करने के लिए विशेष शल्य चिकित्सा की जाती है। मस्तिष्क की रक्तवाहिका में गुब्बारे जैसी कमजोरी यानी धमनीविस्फार के फटने से रक्तस्राव होने पर, उपयुक्त मामलों में, रक्तवाहिका के भीतर कुंडली डालने जैसी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। लेकिन आधुनिक तकनीक ही पूरी लड़ाई नहीं जीतती। उपचार के बाद शारीरिक व्यायाम चिकित्सा, बोलने और भाषा संबंधी चिकित्सा तथा अन्य पुनर्वास सेवाएं मरीज को दोबारा चलने, बोलने और दैनिक गतिविधियां करने में मदद कर सकती हैं। परिवार का सहयोग, नियमित चिकित्सकीय निगरानी और धैर्य भी इस सफर के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

बचाव ही सबसे मजबूत सुरक्षा कवच

स्ट्रोक के खतरे को कम करने के लिए रक्तचाप, मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रण में रखना बेहद जरूरी है। नियमित स्वास्थ्य जांच कराएं, संतुलित भोजन लें, नमक का सेवन सीमित रखें, शारीरिक रूप से सक्रिय रहें, धूम्रपान छोड़ें और शराब से दूरी बनाए रखें। पर्याप्त नींद लें और हृदय की बीमारियों का समय पर उपचार कराएं।जिन लोगों को पहले स्ट्रोक या क्षणिक मस्तिष्कीय रक्त प्रवाह की कमी का दौरा पड़ चुका है, उन्हें चिकित्सक की सलाह के अनुसार दवाएं नियमित लेनी चाहिए और निर्धारित समय पर जांच करानी चाहिए। दवाएं स्वयं बंद करना दोबारा स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकता है।

जनजागरूकता से बचेगी जान, लापरवाही पर लगेगी लगाम

स्ट्रोक किसी एक व्यक्ति की बीमारी नहीं, बल्कि पूरे परिवार को प्रभावित करने वाली गंभीर चुनौती है। इसके शुरुआती लक्षणों की जानकारी घर के हर सदस्य, विद्यालयों, कार्यालयों और समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचनी चाहिए। किसी व्यक्ति का चेहरा अचानक टेढ़ा हो जाए, हाथ-पैर कमजोर पड़ने लगें या बोलने में परेशानी होने लगे, तो इंतजार करने के बजाय तत्काल चिकित्सा सहायता लें। संदेश साफ है स्ट्रोक के खिलाफ जंग में जागरूकता पहली ढाल, समय पर अस्पताल पहुंचना सबसे बड़ा हथियार और सही उपचार जिंदगी बचाने की मजबूत उम्मीद है। कुछ मिनटों में लिया गया सही फैसला किसी की सांसें बचा सकता है और उसे स्थायी दिव्यांगता से बचने का बेहतर अवसर दे सकता है।

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