ट्रंप से मोहभंग, क्या भारतीय अमेरिकी वोटर अब रिपब्लिकन पार्टी को देंगे झटका?

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अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लिए अहम राजनीतिक परीक्षा बनते जा रहे हैं। वर्ष 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप का समर्थन करने वाले भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं के रुख को लेकर नई बहस छिड़ी है। सवाल यह है कि क्या उस समय रिपब्लिकन खेमे की ओर झुके मतदाता इस बार भी उसके साथ खड़े रहेंगे या अपनी पसंद बदल सकते हैं। भारतीय मूल के मतदाता लंबे समय से मुख्य रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थन करते रहे हैं, इसलिए उनके रुख में संभावित बदलाव चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।

सर्वे में दिखी राजनीतिक पसंद की बदलती तस्वीर

कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के फरवरी 2026 के सर्वे के मुताबिक, भारतीय-अमेरिकियों में डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़ाव घटा है। वर्ष 2020 में जहां 52 प्रतिशत लोगों ने पार्टी से अपनी संबद्धता बताई थी, वहीं 2026 में यह आंकड़ा 46 प्रतिशत दर्ज किया गया। रिपब्लिकन पार्टी से जुड़ाव 19 प्रतिशत रहा, जबकि 29 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने खुद को निर्दलीय बताया। ये आंकड़े संकेत देते हैं कि समुदाय की राजनीतिक पहचान एक ही पार्टी तक सीमित नहीं है।

सर्वे में एक और अहम बात सामने आई। 40 वर्ष से कम उम्र के भारतीय-अमेरिकी पुरुषों में ट्रंप का समर्थन 2024 के 40 प्रतिशत से घटकर 2026 की शुरुआत में 24 प्रतिशत रह गया। हालांकि, सर्वे के आंकड़ों से यह तय नहीं होता कि ये मतदाता आगामी चुनाव में किस पार्टी को वोट देंगे। संभव है कि कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर लौटें, जबकि दूसरे निर्दलीय बने रहें।

आव्रजन नीति और वीजा नियम बने नाराजगी की वजह

भारतीय-अमेरिकी समुदाय में ट्रंप प्रशासन की आव्रजन नीतियों और एच-1बी वीजा से जुड़े कड़े रुख पर चिंता जताई जा रही है। इस कार्यक्रम का इस्तेमाल बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर अमेरिकी कंपनियों में काम करने के लिए करते हैं। ऐसे में वीजा नियमों में सख्ती का असर कर्मचारियों, उनके परिवारों और तकनीकी क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों पर पड़ सकता है।
अमेरिका में भारत से आने वाले सामान पर लगाए गए टैरिफ भी दोनों देशों के संबंधों को लेकर सवाल खड़े करते हैं। कुछ भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं को उम्मीद थी कि ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत संबंधों से द्विपक्षीय रिश्ते मजबूत होंगे। लेकिन व्यापार और आव्रजन के मुद्दों पर मतभेदों ने उन उम्मीदों को चुनौती दी है।

विशेषज्ञों ने जल्द नतीजा निकालने से किया आगाह

राजनीतिक सलाहकार अमित जानी के अनुसार, शुरुआती मतदान, पार्टी पंजीकरण और बैलेट की मांग जैसे संकेत डेमोक्रेटिक पार्टी के उत्साह को समझने में मदद कर सकते हैं। लेकिन इनसे यह साबित नहीं होता कि मतदाता ने वास्तव में किस उम्मीदवार को वोट दिया है। दक्षिण एशियाई समुदाय से जुड़ी नेहा दीवान ने भी कहा कि डेमोक्रेटिक मतदाता अक्सर जल्दी मतदान करते हैं, इसलिए शुरुआती आंकड़ों को अंतिम जनादेश मानना उचित नहीं होगा।

भारतीय-अमेरिकी मतदाता अब एक जैसा समूह नहीं

विशेषज्ञों के मुताबिक, भारतीय-अमेरिकी समुदाय के भीतर उम्र, लिंग, जन्मस्थान और व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर राजनीतिक विचार अलग-अलग हैं। महंगाई, परिवारों की आर्थिक चुनौतियां और आव्रजन प्रवर्तन की कार्रवाइयां भी मतदाताओं की चिंताओं को प्रभावित कर सकती हैं। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारतीय-अमेरिकी मतदाता सामूहिक रूप से ट्रंप से दूरी बना चुके हैं। सर्वे और शुरुआती मतदान के संकेत बदलते रुझान की ओर इशारा जरूर करते हैं, लेकिन अंतिम तस्वीर मतदान और नतीजों के बाद ही साफ होगी।

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