खुले ऑपरेशन से रोबोटिक सर्जरी तक एम्स में बदली पित्त की थैली की सर्जरी की कहानी

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नई दिल्ली: पित्त की थैली का ऑपरेशन बाहर से देखने पर भले ही आसान नजर आए, लेकिन ऑपरेशन थिएटर के अंदर पहुंचते ही कई बार तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। गंभीर सूजन, अंदर चिपके हुए ऊतक, पुरानी बीमारी के कारण बने निशान और शरीर के अंदर बदली हुई संरचना सर्जन के सामने ऐसी चुनौती खड़ी कर सकती है, जहां छोटी-सी चूक भी जोखिम बढ़ा सकती है। ऐसे जटिल मामलों में अब रोबोटिक-सहायता प्राप्त सर्जरी तकनीक को एक महत्वपूर्ण विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) नई दिल्ली के सर्जिकल डिसिप्लिन विभाग के विशेषज्ञों ने पित्त की थैली की सर्जरी में खुले ऑपरेशन से लेकर मिनी-लैप्रोटॉमी पारंपरिक लैप्रोस्कोपी और अब रोबोटिक सर्जरी तक के सफर को रेखांकित किया है। विभाग में विभिन्न विशेषज्ञताओं में 1,500 से अधिक रोबोटिक-सहायता प्राप्त सर्जरी का अनुभव भी इस तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल को दर्शाता है।

एम्स के सर्जिकल डिसिप्लिन विभाग के प्रोफेसर हेमंगा के. भट्टाचार्जी के मुताबिक पित्त की थैली की सर्जरी हमेशा एक जैसी नहीं होती। ऑपरेशन शुरू होने से पहले सूजन और अंदरूनी चिपकाव की वास्तविक स्थिति का पूरी तरह अंदाजा लगाना कई बार संभव नहीं होता। ऑपरेशन के दौरान सामने आने वाली वास्तविक शारीरिक संरचना पहले की अपेक्षा से बिल्कुल अलग हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में रोबोटिक तकनीक बेहतर दृश्यता और उपकरणों पर अधिक नियंत्रित संचालन उपलब्ध कराकर सर्जन को जटिल संरचनाओं के बीच काम करने में मदद कर सकती है।

तीन आयामों में दिखाई देती है अंदर की तस्वीर

एम्स में इस्तेमाल होने वाली दा विंची रोबोटिक प्रणाली सर्जन को उच्च गुणवत्ता वाली त्रि-आयामी तस्वीर उपलब्ध कराती है। इसके साथ लगे विशेष उपकरण अलग-अलग कोणों से नियंत्रित तरीके से मूवमेंट करने में सक्षम होते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार जब शरीर के अंदर किसी हिस्से को देखना या वहां तक उपकरण पहुंचाना मुश्किल हो, तब यह तकनीकी क्षमता उपयोगी साबित हो सकती है। यहां खास बात यह है कि रोबोट अपने आप ऑपरेशन नहीं करता। पूरी प्रक्रिया के दौरान नियंत्रण ऑपरेशन करने वाले सर्जन के हाथ में ही रहता है। रोबोटिक प्रणाली सर्जन की जगह नहीं लेती, बल्कि उसे बेहतर दृश्यता और उपकरणों के संचालन की अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध कराती है। अंतिम निर्णय सर्जन की चिकित्सकीय समझ और अनुभव पर ही निर्भर रहता है।

नई पीढ़ी के सर्जनों के लिए भी तकनीक अहम

एम्स के सर्जरी यूनिट-4 के प्रमुख प्रोफेसर असुरी कृष्णा ने रोबोटिक-सहायता प्राप्त सर्जरी को आने वाले सर्जनों के प्रशिक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार न्यूनतम चीरा आधारित सर्जरी सीख रहे चिकित्सकों के लिए रोबोटिक प्रणाली शरीर की संरचना को समझने और उपकरणों की नियंत्रित गतिविधियों को सीखने का एक अलग माध्यम उपलब्ध कराती है। इससे प्रशिक्षण के दौरान सर्जनों के कौशल और आत्मविश्वास को विकसित करने में मदद मिल सकती है।

खुले ऑपरेशन से रोबोट तक सर्जरी की बदलती तस्वीर के गवाह हैं डॉ. चंबर

पित्त की थैली की सर्जरी के बदलते दौर को करीब से देखने वाले डॉ. सुनील चंबर, प्रमुख, सर्जिकल डिसिप्लिन विभाग, एम्स दिल्ली ने इस सफर को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने अपने करियर में खुले ऑपरेशन, मिनी-लैप्रोटॉमी, पारंपरिक लैप्रोस्कोपिक सर्जरी और अब रोबोटिक-सहायता प्राप्त सर्जरी—सभी तकनीकों के साथ काम किया है।

डॉ. चंबर के अनुसार सर्जरी की हर नई तकनीक अपने पिछले दौर की उपलब्धियों पर आगे बढ़ती है। उनके अनुभव में लैप्रोस्कोपी ने पित्त की थैली की सर्जरी में बड़ा बदलाव किया था, लेकिन रोबोटिक प्रणाली इस विकास यात्रा में एक और महत्वपूर्ण कदम है।

उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में जैसे-जैसे सर्जन रोबोटिक तकनीक में अधिक अनुभव हासिल करेंगे, पित्त की थैली की सर्जरी के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है और भविष्य में रोबोटिक सर्जरी का इस्तेमाल और बढ़ सकता है।

खुले ऑपरेशन से मिनी-लैप्रोटॉमी, फिर लैप्रोस्कोपी और अब रोबोटिक्स—पित्त की थैली की सर्जरी ने लंबा सफर तय किया है। एम्स के विशेषज्ञों के अनुभव के मुताबिक तकनीक का यह सफर केवल मशीनों के बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि सर्जन को अधिक स्पष्टता, नियंत्रण और जटिल परिस्थितियों में काम करने की अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध कराने की दिशा में भी एक बदलाव है।

एम्स नई दिल्ली की स्थापना वर्ष 1956 में संसद के अधिनियम के माध्यम से हुई थी। यह राष्ट्रीय महत्व का स्वायत्त संस्थान है, जहां मरीजों के उपचार के साथ चिकित्सा शिक्षा, प्रशिक्षण और अनुसंधान का कार्य भी किया जाता है। संस्थान विभिन्न चिकित्सा और सुपर-स्पेशियलिटी क्षेत्रों में सेवाएं प्रदान करता है और देश में चिकित्सा शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं के मानकों को आगे बढ़ाने की दिशा में लंबे समय से कार्यरत है।

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