नई दिल्ली: दुनिया भर में ईंधन की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ रही है। इसी बीच G7 देशों ने अपने आपातकालीन भंडार से 10 करोड़ बैरल कच्चा तेल और डीजल बाजार में उतारने का फैसला किया है। इसके साथ सदस्य देशों ने भरोसा दिया है कि वे ऊर्जा के निर्यात पर कोई पाबंदी नहीं लगाएंगे। माना जा रहा है कि यह फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव का नतीजा है। नवंबर में मिडटर्म चुनाव होने हैं और ट्रंप चाहते हैं कि उससे पहले पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम काबू में आ जाएं। चुनाव से पहले महंगा ईंधन किसी भी सरकार के लिए सिरदर्द बन सकता है।
अमेरिका ने यूरोपीय संघ से साफ कहा था कि वह अपने आपातकालीन डीजल भंडार से तेल निकाले। ट्रंप प्रशासन ने यह चेतावनी भी दी थी कि ऐसा न होने पर अमेरिका डीजल का निर्यात रोक सकता है। यह धमकी हल्की नहीं थी, क्योंकि यूरोप अब पहले से कहीं ज्यादा अमेरिकी डीजल पर निर्भर है। सप्लाई घटती तो यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था को भारी चोट पहुंच सकती थी।
पहले भी खुल चुके हैं तेल भंडार
यह पहली बार नहीं है जब आपातकालीन भंडार का सहारा लिया गया हो। ईरान युद्ध के बाद मार्च में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की अगुवाई में 40 करोड़ बैरल तेल जारी करने पर सहमति बनी थी। यह अब तक की सबसे बड़ी आपातकालीन रिलीज थी। G7 ने अपने साझा बयान में कहा है कि जो वादे पहले ही पूरे हो चुके हैं, उन्हें ध्यान में रखकर IEA के जरिए 10 करोड़ बैरल की समन्वित रिलीज की जाएगी। यानी सभी देश आपसी तालमेल से यह कदम उठाएंगे।
एक बात अब भी साफ नहीं
सबसे बड़ा सवाल यह है कि नए समझौते का कितना तेल मार्च वाले समझौते के बचे हिस्से से आएगा। IEA के कार्यकारी निदेशक फतिह बिरोल ने इसी हफ्ते बताया था कि सदस्य देश 40 करोड़ बैरल वाले समझौते का करीब दो तिहाई हिस्सा जारी कर चुके हैं। इसका मतलब है कि लगभग एक तिहाई तेल अभी बाकी है, और नई रिलीज में उसका कितना हिस्सा गिना जाएगा, यह तय नहीं है।
कुल मिलाकर G7 का यह कदम ईंधन की कीमतों को थामने की कोशिश है। ट्रंप के लिए यह फैसला खास मायने रखता है, क्योंकि चुनाव सिर पर हैं। अब देखना होगा कि इस रिलीज का बाजार पर कितना असर पड़ता है।












