भारत-जापान की गुपचुप डील ने हिलाया चीन का तख्त, समुद्र में ड्रैगन को घेरने की तैयारी

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नई दिल्ली: हिंद-प्रशांत महासागर के विशाल जलक्षेत्र में चीन लंबे समय से अपनी बढ़ती दादागिरी से हर पड़ोसी देश को डराता रहा है। लेकिन अब समुद्र के दो सबसे मजबूत खिलाड़ियों ने मिलकर ऐसा रणनीतिक कदम उठाया है, जिसे बीजिंग के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। देखने में यह एक साधारण और आपसी सहयोग वाली रक्षा डील लगती है, लेकिन पर्दे के पीछे यह एक ऐसा कूटनीतिक दांव है, जो सीधे चीन की नौसेना की सबसे बड़ी ताकत पर चोट करता है। इस एक कदम से समुद्र के भीतर ड्रैगन की जासूसी पर लगाम लगेगी, और साथ ही एक साथ पांच ऐसे मकसद पूरे किए जा रहे हैं, जो आने वाले समय में पूरे एशिया की शक्ति संरचना को बदल सकते हैं।

इस पूरे रणनीतिक कदम की नींव 20 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में रखी गई, जब भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी ने एक साथ बैठकर ‘मेमोरेंडम ऑफ अरेंजमेंट ऑन मैरीटाइम सिक्योरिटी कोऑपरेशन’ पर हस्ताक्षर किए। कागजों पर देखा जाए तो यह समझौता आपदा राहत, सर्च एंड रेस्क्यू और समुद्री सूचनाओं को साझा करने की बात करता है। लेकिन इसका असली उद्देश्य हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में चीन की पनडुब्बियों और युद्धपोतों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखना है। यह साझेदारी बिना किसी शोर-शराबे के चीन को यह संकेत देती है कि अब भारत और जापान समंदर के हर हिस्से में एक-दूसरे के लिए आंख और कान का काम करेंगे।

एक समझौते से साधे गए पांच बड़े निशाने

नई दिल्ली में हुई इस अहम बैठक में दोनों देशों ने मैरीटाइम सिक्योरिटी पैक्ट पर दस्तखत किए, जिसका मकसद हिंद-प्रशांत क्षेत्र को खुला, सुरक्षित और नियम-आधारित बनाए रखना है। इस एक समझौते के जरिए भारत और जापान ने पांच बड़े मोर्चों पर एक साथ काम करने की योजना बनाई है। पहला है मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस, यानी समुद्र की सतह पर चलने वाले जहाजों से लेकर गहराई में छिपी चीनी पनडुब्बियों तक की रियल-टाइम जानकारी और लोकेशन को आपस में साझा करना। दूसरा पहलू है जहाजों की मरम्मत और लॉजिस्टिक्स से जुड़ा, जिसके तहत दोनों देशों की नौसेनाएं एक-दूसरे के मिलिट्री बेस और बंदरगाहों का इस्तेमाल कर सकेंगी, और ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत भारतीय शिपयार्ड्स में जापानी जहाजों की मरम्मत भी होगी।

तीसरा अहम बिंदु है हाई-टेक डिफेंस तकनीक, जिसके तहत दोनों देश ‘यूनिकॉर्न’ नाम के अत्याधुनिक कम्युनिकेशन एंटीना सिस्टम को भारतीय युद्धपोतों पर लगाने के प्रोजेक्ट को तेजी से आगे बढ़ाएंगे। चौथा पहलू सैन्य अभ्यासों से जुड़ा है, जिसमें ‘जिमेक्स’, ‘धर्म गार्जियन’ के साथ-साथ ‘वीर गार्जियन 26’ हवाई अभ्यास में पहली बार जापानी लड़ाकू विमान भारत में हिस्सा लेंगे, और स्पेशल फोर्सेस की ट्रेनिंग भी बढ़ाई जाएगी। पांचवां और आखिरी मोर्चा है चीन की घेराबंदी, जिसके तहत दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद महासागर तक फैले समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा के लिए दोनों देश साझा गश्त करेंगे।

‘तेजुमा’ की कला जैसा है यह पूरा समझौता

जापान में एक बहुत पुरानी जादुई कला है, जिसे ‘तेजुमा’ कहा जाता है। इसमें कलाकार आपकी आंखों के सामने कागज के एक टुकड़े को उंगलियों की सफाई से उड़ती हुई तितली में बदल देता है, और देखने वाले को यह सिर्फ एक खेल लगता है, जबकि इसके पीछे कलाकार की वर्षों की मेहनत छिपी होती है। भारत और जापान का यह नया समझौता भी बिल्कुल इसी कला जैसा है। दुनिया को दिखाने के लिए इसे ‘सर्च एंड रेस्क्यू’ और ‘आपदा राहत’ का नाम दिया गया है, लेकिन इसके पीछे असली मकसद एंटी सबमरीन वॉरफेयर और गुप्त जानकारी का आदान-प्रदान करना है। समुद्र की गहराई में छिपी दुश्मन की पनडुब्बी को ढूंढना नौसेना के लिए सबसे कठिन काम माना जाता है, लेकिन ‘सर्च एंड रेस्क्यू’ के नाम पर दोनों देश आसानी से एक-दूसरे को पनडुब्बियों की सटीक लोकेशन और गोपनीय जानकारी साझा कर सकते हैं। इससे न तो जापान के सख्त कानूनों का उल्लंघन होता है, और न ही भारत की गुटनिरपेक्ष नीति पर कोई सवाल उठता है।

सबमरीन रेस्क्यू में भारत की बढ़ती ताकत

भारत ने पिछले कुछ सालों में चुपचाप अपनी नौसेना की गहरे समुद्र में काम करने की क्षमता को कई गुना बढ़ा लिया है। साल 2018 में भारत उन गिने-चुने देशों की सूची में शामिल हो गया था, जो गहरे समुद्र में फंसी पनडुब्बियों से नौसैनिकों को सुरक्षित बाहर निकालने की क्षमता रखते हैं। हिंदुस्तान शिपयार्ड में तैयार किए गए ‘आईएनएस निस्तार’ को जुलाई 2025 में नौसेना में शामिल किया गया था, जबकि इसका दूसरा साथी जहाज साल 2026 में बेड़े का हिस्सा बना। आईएनएस निस्तार 300 मीटर की गहराई तक गोताखोरों को भेज सकता है, और यह गहरे समुद्र में रेस्क्यू ऑपरेशन का प्रमुख केंद्र बन चुका है। भारत ने इसी खास क्षमता के दम पर कई देशों को अपने साथ जोड़ा है, जिनमें जनवरी 2021 में सिंगापुर, सितंबर 2024 में दक्षिण अफ्रीका, अक्टूबर 2025 में ऑस्ट्रेलिया और नवंबर 2025 में वियतनाम शामिल हैं।

वहीं जापान के पास ‘चिहाया’ और ‘चियोदा’ जैसे अपने खुद के एडवांस रेस्क्यू जहाज दशकों से मौजूद हैं, इसलिए उसे भारत के जहाजों की सीधी जरूरत नहीं है। जापान के लिए इस समझौते का सबसे बड़ा फायदा यह है कि उसकी नौसेना को भारतीय समुद्री सीमा में आने-जाने का पहले से स्वीकृत रास्ता मिल जाता है, और दोनों देशों के बीच पनडुब्बियों की लोकेशन साझा करने का एक सुरक्षित और गोपनीय चैनल तैयार हो जाता है।

चीन की दो सबसे बड़ी कमजोरियां

पश्चिमी देश और मीडिया अक्सर चीन के जहाजों की भारी संख्या देखकर उसे समुद्र की नई महाशक्ति घोषित करने की जल्दी दिखाते हैं। लेकिन सिर्फ बड़ी संख्या में जहाज बना लेने से कोई नौसेना असली युद्ध जीतने के काबिल नहीं बन जाती। चीन की नौसेना की असली ताकत पर आज भी कई सवाल खड़े हैं। पहली कमजोरी है ट्रेनिंग की, क्योंकि चीन अपने नौसेना पायलटों को प्रशिक्षित करने के लिए ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व सैन्य पायलटों को भारी रकम देकर किराए पर रखता है, जो यह साबित करता है कि उसके पास खुद का मजबूत ट्रेनिंग सिस्टम नहीं है। दूसरी बड़ी कमजोरी है सच्चे सहयोगियों की कमी, क्योंकि चीन ने सिर्फ फैक्ट्रियों में जहाज बनाए हैं, लेकिन उसके पास ऐसे भरोसेमंद मित्र देशों का नेटवर्क नहीं है, जो जरूरत पड़ने पर उसके जहाजों को सहायता या सुरक्षा दे सकें। इसके उलट भारत ने अपनी मेहनत और भरोसेमंद रवैये के दम पर धीरे-धीरे पूरी दुनिया का विश्वास जीता है।

बिना नाम लिए दिया गया ड्रैगन को साफ संदेश

भारत और जापान के इस अहम समझौते के पूरे दस्तावेज में कहीं भी ‘चीन’ या ‘ड्रैगन’ शब्द का जिक्र नहीं किया गया है। लेकिन हिंद-प्रशांत की राजनीति समझने वाला हर विशेषज्ञ और दुनिया की हर नौसेना अच्छी तरह जानती है कि यह निशाना आखिर किस पर साधा गया है। जापान की ‘तेजुमा’ कला की तरह ही इस समझौते का हर कदम इतनी बारीकी से उठाया गया है कि चीन चाहकर भी इस पर कोई आधिकारिक आपत्ति दर्ज नहीं करा सकता। भले ही दुनिया भारत को एक ‘क्षेत्रीय ताकत’ और चीन को ‘महाशक्ति’ कहती हो, लेकिन इस डिफेंस पैक्ट ने यह जरूर साफ कर दिया है कि जब समुद्र की गहराइयों में असली रणनीति बिछाई जाएगी, तो किसकी चालें भारी पड़ेंगी।

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