नई दिल्ली: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष माना गया है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को इंदिरा एकादशी कहा जाता है। खास बात यह है कि यह व्रत पितृपक्ष के दौरान आता है, इसलिए इसका संबंध पितरों की शांति और उनके कल्याण से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा और नियमपूर्वक इंदिरा एकादशी का व्रत करने से व्रती के साथ उसके पितरों को भी पुण्य फल मिल सकता है। इस व्रत का उल्लेख पद्म पुराण में भी मिलता है।
दशमी से शुरू होती है व्रत की तैयारी
पद्म पुराण में इंदिरा एकादशी की तैयारी दशमी तिथि से शुरू करने की बात कही गई है। इस दिन सुबह स्नान करने के बाद दोपहर में दोबारा स्नान कर सात्विक भोजन करने का विधान बताया गया है। दशमी से ही भोजन में शुद्धता रखने और ब्रह्मचर्य का पालन करने की बात कही गई है। रात में जमीन पर सोने का भी उल्लेख मिलता है।
एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प लेकर विधि-विधान से पूजा करें। धार्मिक ग्रंथों में इस दौरान निराहार रहने और भगवान विष्णु की शरण लेने का संकल्प मंत्र बताया गया है।
पितरों के लिए श्राद्ध का विधान
इंदिरा एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा के साथ पितरों के निमित्त श्राद्ध करने की भी परंपरा बताई गई है। दोपहर के समय शालिग्राम शिला के सामने पितरों के लिए श्राद्ध किया जाता है। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराने और दक्षिणा देने का विधान है। पितरों को अर्पित पिंड को गाय को खिलाने की बात भी पद्म पुराण में कही गई है।
रात में भगवान विष्णु के नाम का जाप या जागरण करने के बाद अगले दिन द्वादशी पर पूजा की जाती है। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराने के पश्चात परिवार के साथ भोजन कर व्रत का पारण किया जाता है।
व्रत में इन नियमों का रखें ध्यान
इंदिरा एकादशी के दिन चावल का सेवन न करने की धार्मिक मान्यता है। व्रत के दौरान क्रोध, विवाद और नकारात्मक विचारों से बचना चाहिए। साथ ही, एकादशी और द्वादशी पर तुलसी के पत्ते तोड़ने से भी परहेज करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा से किए गए इस व्रत से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति और भगवान विष्णु की कृपा मिल सकती है।












