नई दिल्ली: गणपति बप्पा के भक्तों के मन में इन दिनों एक सवाल बार-बार उठ रहा है- अगर गणेश उत्सव दस दिनों का पर्व है, तो फिर बप्पा की विदाई 23 सितंबर की बजाय 25 सितंबर को क्यों हो रही है? यह उलझन सिर्फ आपके मन में नहीं, बल्कि हजारों श्रद्धालुओं के दिमाग में चल रही है। असल में इसका जवाब अंग्रेजी कैलेंडर की तारीखों में नहीं, बल्कि हिंदू पंचांग की तिथियों में छिपा है।
इस बार गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को मनाई गई थी। अगर सीधे तारीखों की गिनती करें, तो 14 सितंबर पहला दिन और 23 सितंबर दसवां दिन बैठता है। यही वजह है कि बहुत से लोग मान बैठे हैं कि दस दिन पूरे होते ही विसर्जन कर देना चाहिए। लेकिन हिंदू धर्म में पर्व केवल तारीखों से नहीं, बल्कि तिथियों से तय होते हैं। गणेश उत्सव भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से आरंभ होकर अनंत चतुर्दशी के दिन ही संपन्न माना जाता है, इसलिए मुख्य विसर्जन के लिए चतुर्दशी तिथि का आना जरूरी है, न कि सिर्फ दस तारीखों का बीतना।
पंचांग के मुताबिक 23 सितंबर को भाद्रपद शुक्ल द्वादशी तिथि रहेगी, और इसी दिन वामन जयंती का पर्व भी मनाया जाएगा। इसके बाद क्रमशः त्रयोदशी और फिर चतुर्दशी तिथि आएगी। भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी तिथि 24 सितंबर की रात करीब 11:17 बजे शुरू होकर 25 सितंबर की रात लगभग 11:08 बजे तक रहेगी। चूंकि 25 सितंबर को सूर्योदय के समय चतुर्दशी तिथि मौजूद रहेगी, इसलिए इसी दिन अनंत चतुर्दशी मनाई जाएगी और गणपति बप्पा की मुख्य विदाई भी इसी दिन होगी।
क्या 23 सितंबर को विसर्जन करना गलत?
अंग्रेजी कैलेंडर की हर तारीख आधी रात 12 बजे बदल जाती है, जबकि पंचांग की तिथियां चंद्रमा और सूर्य की गति पर निर्भर करती हैं, जिस वजह से कोई तिथि 24 घंटे से छोटी या बड़ी हो सकती है। यही कारण है कि दस दिनों का कहा जाने वाला गणेश उत्सव कैलेंडर में कई बार दस से ज्यादा तारीखों तक फैल जाता है। इस साल 14 से 25 सितंबर के बीच कुल बारह तारीखें आ रही हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि धार्मिक गणना में कोई चूक हुई है, क्योंकि उत्सव हमेशा चतुर्थी से चतुर्दशी तिथि तक ही मापा जाता है।
वहीं, घर में विराजमान गणपति का विसर्जन परिवार की परंपरा और संकल्प के अनुसार डेढ़, तीन, पांच, सात या किसी अन्य दिन भी किया जा सकता है। अगर किसी परिवार ने 23 सितंबर को विदाई का संकल्प लिया है, तो अपने कुल परंपरा या पुरोहित की सलाह लेकर विसर्जन किया जा सकता है। लेकिन जिन्होंने बप्पा को अनंत चतुर्दशी तक रखने का संकल्प लिया है, उन्हें 25 सितंबर तक इंतजार करना चाहिए। सार्वजनिक पंडालों में भी मुख्य विसर्जन आमतौर पर अनंत चतुर्दशी के दिन ही होता है।












